OCD

ओ सी डी स्कूल में ऐसे ही छोटी सी बहस हो रही थी। साइंस टीचर श्याम सिंह के कथन पर सारे के सारे टीचर ठहाके...

आज का विचार

कुछ पन्ने उजले तो कुछ स्याह सही हर इम्तिहान कुछ नया सिखा के गया

अना की खातिर ना कीचड़ उछालिये /ग़ज़ल

  जुदा हर जिन्दगी का फलसफा है दोस्त गैर की किस्मत का न सिक्का उछालिये             इसी मकतल में उसने सदियाँ गुजार...

काग़ज़ के टुकड़े

काग़ज़ के टुकड़े चंद टुकड़े कागज के देकर विदा किया सदियाँ संग जिसके हंसकर गुजार दीं  खिलौने भर औकात लिए घूमते रहे खेलकर चाबी उसने दूजे को उछाल...

कागज़

वो कागज़ थे  कोरे अनधुले जज़्बात और हालात ने  गीले और नीले किये सहेजे कुछ इस कदर वक्त ने पीले किये  अनमोल लम्हे जो  शब्दों में बांधे थे दस के भाव में  रद्दी...

माँ की कोख

ये माँ की कोख को शर्मसार करते हैं जा के कह दो माँ से ना जने बेटे ...... बक्से में बंद कर सिराहने रखा करो वो अभी बच्ची...

लोगों को कहने दो

आप हँसना चाहते हैं जोर से चिल्लाना चाहते हैं चाहते हैं सड़क किनारे खाना कुलचे चाहते हैं सिस्टम पर लगाना पंच दिन भर की भगदौड़ से परे चाहते हैं...

लौट आओ

लौट आओ ऐ परिंदो अपने आशियानों को इससे पहले कि  दर ओ दीवार न रहें

फूल

फूल को गुल कहा वो मुसलमान हो गया मेरे अज़ीज मुझे हिन्दू कहा करते हैं

मैंक्यों रुकूँ???

मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ..  दूसरे की ताल पर गीत कोई  क्यों लिखूँ              माना बड़ी उड़ान है        ...

बच्चे तालियाँ बजाते हैं…

बच्चे खिलखिलाते हैं हँसते हैं तकते हैं अबूझ किस्सों कों परियों की कहानियाँ उन्हें आज भी लुभाती हैं पहाड़ पर चढ़ती विशाल मकड़ी रेत...

अवकाश

नवसृजन को चाहिये अवकाश प्रत्येक दिन घूमना एक ही धुरी पर करता है बोझिल ज़िन्दगी को जरूरी तो नहीं हाथी के कान लेकर  खड़े रहें जमीन पर तितलियों के...

सच

क्या आप भी  सरेआम सच  कहना चाहते हैं ये शहर सच को नकारता है जनाब .............. .  जब भी सच कहा लोग खिलखिला के हँसे आज के दौर में  सच चुटकुले सा है .........

Guest.. Maina

क्या आपने सुना हुज़ूर  मैना ने सर मुंडवाया है  वो एक सैनिक की बेवा है संग सैनिक का साया है  पीछे उसके अतिथिगण की भरी पुरी एक सेना है जल्दी...

मन ये चाहे तू बच्चा हो जा

मन ये चाहे तू बच्चा  हो जा  खफ़ा सच से मगर सारा जहाँ रहता  है मुँह पर तेरा पीठ फिरते ही फिरा जहाँ ये दोगला  सच को...

लाल दीवारें..

लाल दीवारें /भीगी नहीं हैरान थी  दीवारों से निकल   देखने आईं कुछ आँखें  हो विकल बारम्बार      कदम रह गये ठिठक कर उस द्वार  जिसके पीछे बहुत सी...

बातें हैं..

बात जब मैं की चली है तो चलो मैं भी कह दूँ तुम अपनी मैं में रहो मैं खुदी में खुृश हूँ तुमसे बेहतर न सही...

बजट के बहाने

कभी हम हँसे कभी वो हँसे है ज़िन्दगी का बजट यही फिर क्या गिला कितना मिला कभी वो सही कभी हम सही

पाक की नापाक हरकत

सैंसर के पहले की फिल्म कैसे पहुँची पाकिस्तान ??    जयचंद मेरे मुल्क के मुगालते में हैं   पैरों तले ज़मीन शायद सीधी सपाट है बेगैरत हैं...

लक्ष्य

लक्ष्य चाहे कितना बड़ा हो शुरुआत जमीन से करनी पड़ती है...प्रीति