चन्द शेर
मेरे जेहन में रिश्तों की जो परिभाषा थी
वो बदल दी उसने जिसे खुदा से मांगा
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इस दफा हिसाब सही
जो निकले गुणा भाग कर
जब मेरी बारी...
बारिश
आज मजे हैं बारिश हो गई
बस्ते से बस कुट्टी है
छुट्टी हो या न हो भैया
अपनी तो बस छुट्टी है
आज मजे हैं......
छप छप करती बारिश...
नाचें अंबर और गुड़िया/बारिश /बाल कविता
वृक्ष मगन सब देख घिरे घन
नाचें अंबर और गुड़िया
निकले घर से चुन्नू मुन्नू
जादू की लेने पुड़िया
दादी रोकें मम्मी टोके
बारिश में तुम न जाना
ठंडी लग...
पहली बारिश
पहली बारिश
सौंधी गंध
रोज बरसात
धुल गये छंद
गुड़हल फूले
चहुँदिस मकरंद
पहली बारिश
सौंधी गंध
धुले घाट
उखड़े बाट
गाड़ी के छींटे...
तिनका
तितलियों से रंग ले
वो उड़ती पात पात पर
मुमुस्कुराती झूमती
वो समय की बिसात पर
मुट्ठियाँ कसी हुई
हौंसले बुलंद थे
लाल लाल अधरों
पर रौशन...
गिनती
वो आये/औंधे किये गये
लगाये गये ठप्पे/जतन से सफेद
अनपढ़ कामगारों ने गिन डाले सारे
गिनती सीखना
उतना बड़ा काम नहीं था
जितना गिनती को बनाए रखना...
कंदीलें
है घना बहुत अंधेरा
कंदीलें जला लो यारों
घटा ने चाँद छिपाया है
हौसलों को नहीं
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बारिश की आगवानी में
आदमी दलदल हुआ
बादल उम्मीद से
ज्यादा चले...
आजादी क्या मिली वो स्वच्छंद हो गये
आजादी क्या मिली
वो स्वच्छंद हो गये
कतारों में लगे लोग
लामबंद हो गये
हांकने वाले भी थे
हुजूम में शामिल
आजाद तराने गलों
में बंद हो गए
जलसा जुलूस में
तब्दील हो...
आज शांत बहुत शांत है मन
शांत बहुत शांत है मन आज
अगले कुछ रोज मैं और मेरी
लेखनी होगी
रचेंगे किस्से.....
परियों के ना सही
कासिद की बातें
सक्षम के सफर में
अम्मा का इंतजार
कानून की...
देश भक्ति गीत /ए भगतसिंह तेरी फिर आज जरूरत है
ए भगतसिंह तेरी फिर आज जरूरत है
तू लौट के आजा रे खाली तेरी मूरत है
मेरे देश को खतरा है घर के गद्दारों से
इन जात...
स्वतंत्रता दिवस पर दिल से
बात जब जश्न ए आजादी की चली है तो चलो हम भी कह दें..
तिरंगा शान है मेरी तिरंगा जान है मेरी
इसके रहते मुझे...
नदी
फिर तोड़कर चली है वो बांध और किनारे
हँसते थे कभी जिसको अल्हड़ सी नदी कहकर
मायूस न हो लौटना अब उसका नहीं होगा
सदियों से था...
मन रीता सा क्यों है /अजान और घंटों में जंग
रुककर कब किसी को
हासिल हुआ मुकाम
मील के पत्थर ने
फुसफुसा कर फरमाया
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आजाद देश में आजादी से दुआ
पढ़ मगर शोर न कर खुदा के बंदे
अजान और...
रही होगी वजह कोई.. प्रीति
रही होगी वजह कोई जो
उसने छोड़ दी महफिल
उसे मगरूर कहकर क्यों
भला हर पल चिढ़ाते हो
है ढाई चाल में माहिर
ना बैसाखियों पर जा
है लम्बी रेस...
सोशल मीडिया दीमक है
वो सुनेंगे भी
देखेंगे भी
पर कर सकेंगे
कुछ नहीं
वो क्या जाने
सोशल मीडिया
दीमक है..
मीडिया से
भी भयावह
दांत वाला
हाथ वाला
हाथ भी ऐसे
कांधों पे बिठा लें
जी में आये तो
कुर्सी से...
अशआर
क्या जरूरी है कि कुछ बोल के समझाया जाये
लोग चुप रह कर भी हाले दिल बयान करतें हैं
हर बात बोल के समझाओ ये जरूरी...
No more jokes on ladies…
मैं औरत हूँ
हर सब्जी में मिल खुश
होना चाहती हूँ
क्या करूँ
उसने हरा जामा पहनाया
लगे अगर किसी को
मेरा क्या कुसूर
मैं भी सोई हुई थी..
अचानक जागरण हुआ
क्या...
कुछ अशआर.. ए..दिल
मैं अपने काम को निष्ठा से करती आई हूँ
मुझे परवाह नहीं वो राजा हैं या औरंगजेब
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बेहतर है हम अपने काम में
ईमान कायम रखें
दुनिया की...





























