विद्यालय

हाल देखिए विद्यालय का कैसे काम तमाम हुआ सारा सरकारी अमला क्यों कर है बदनाम हुआ नौ तक आ जाते हैं छ:के छ:बारी-बारी राशन बँटते ही कर लेते हैं जाने की तैयारी एक को जाना राशन लेने दूजे...

विज्ञापन

 उपभोक्तावादी संस्कृति/सभ्यता हर चेहरा एक विज्ञापन एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ एक दूसरे को नीचा दिखाने की चाह हर एक उत्पाद आता नजर दूसरे की टांग खींचता प्रतिस्पर्धा नहीं ईर्ष्या  बन गई  है नीयति इस संस्कृति और सभ्यता की विज्ञापनों...

दस्तक

दस्तक जीवन की मजारों पर अक्सर अनसुनी हो जाती हैं खुशनुमा दिनों की शमा हर रात पिघल जाती है मुरझा जाते हैं गुल सूखती स्मृति  से जीती जागती कुछ जोड़ने की चाह लिए आई पदचापें वक्त को टूटे पत्तों सा...

कभी नफरतों के चलते

कभी नफरतों के चलते मैं हो गया किसी का कभी चाहतों ने बढ़कर बुला लिया मुझे कभी सरेराह यूं ही साथ नहीं छूटा कभी दूर जा कर राह ने रुला दिया मुझे

Do guz jamin

अब कोई सांझ नहीं अब ना आसमां कोई ज़मी पर रहने वालों को दो गज जमीन  काफी है

Kabhi Zindagi se Milo

कभी ज़िन्दगी से मिलो जो तुम उसे इत्तला करना ज़रूर कभी मैं खफा कभी वो खफा कितनी दफा मरना हुज़ूर जो सुबह मिली तो थी धानी सी सरे शाम से थी सयानी सी परिजात सी मैं बिखर गई गिला आज भी...

मौन

तोते टिटियाते नहीं आलसी पग भी दिन भर पड़ा रहता है अपने छोटे टोकरे में मछलियाँ तो पहले ही बेजुबान नाचती हैं इधर से उधर घर में सभी प्राणी जैसे बुद्ध के सानिध्य से उठ चले आयें हों खामोशियाँ खिलखिलाती नहीं...

टॉफ़ी नहीं कॉपी दो

टॉफ़ी देकर खुश करते हो मुझको कॉपी लाकर दो बहुत हुये अब उतरे कपड़े मुझको वर्दी लाकर दो हाथ गाड़ियाँ  बहुत चलाई बालू महल बनाये खूब ढक्कन डिबिया जोड़ लिये हैं स्लेट और बत्ती लाकर दो नहीं जानते कैसे दाखिल करना है विद्यालय...

चलो आज तितलियों का जिक्र करें कैप्शन जोड़ें

चलो आज तितलियों का ज़िक्र करें ज़िन्दगी वो भी हुआ करती थी सपने में टॉफी कहानियों में जलेबी के पेड़ दिन भर उछलकूद गुड़िया गुड्डों की बारातें खाकर पीकर मौज मनाकर लड़कर गुड़िया वापस लाते...