जब परिस्थितियाँ विपरीत हों, क्या करें?

क्या करें? क्या करें?

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जब परिस्थितियाँ विपरीत हों

क्या करें ? 

प्रीति राघव चौहान  

है बहुत अंधेरा कंदीलें जला लो यारों

 घटा ने चांद छुपाया है हौंसला नहीं

  मानव के जीवन में कभी ना कभी विपरीत परिस्थितियां आती ही हैं और उसके लिए हम पहले से कोई तैयारी भी करके नहीं बैठते तो ऐसा क्या करें कि हम उस परिस्थिति से निकल सकें? सबसे पहले तो हमें यह ज्ञान होना जरूरी है कि आज जो परिस्थिति मेरे सामने हैं उसका फिलवक्त कोई कोई इलाज नहीं। जिस वक्त हमें मान लेंगे हम अपने आप को तनाव से थोड़ा बाहर पाएंगे….. जैसे घर में किसी का बीमार हो जाना किसी का दुर्घटना ग्रस्त हो जाना या हमारा अपने ही कार्य के क्षेत्र में अनजानी मुसीबत आ जाना। दुखद पल तेजी से आते हैं। उतनी तेजी से चले भी जाएं तो उन्हें दुखद ही क्यों कहे? इससे निकलने के लिए कुछ बातें बेहद जरूरी है।

1. परिस्थिति को स्वीकारें……. यदि आपके सामने दुखद परिस्थिति हैऔरअ उसे आप स्वीकार लेते हैं.. कि ऐसा मेरे साथ हो चुका है, अब मुझे इससे बाहर आना है। तो आप अपनी लड़ाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा जीत लेते हैं।

2. थामे रहे हैं धैर्य का दामन…..

 किसी भी विपरीत परिस्थिति से निकलने के लिए धैर्य का होना बहुत जरूरी है। यदि आप धीरज खो बैठते हैं तो निश्चित ही आपको इस परिस्थिति से कोई नहीं निकाल सकेगा क्योंकि जो बिगड़ चुका वह तो पहले ही बिगड़ चुका और आपके धैर्य खो बैठने से परिस्थितियां और भी प्रतिकूल हो जाएंगी। अधीर होकर आप क्या करेंगे रोएंगे। गिड़गिड़ाएंगे या अपने आप को नुकसान पहुंचाएंगे। आपको इनमें से कुछ भी नहीं करना है। आप केवल धीरज रखें।

इस विषय में एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहूंगी आधी रात का वक़्त था नींद ना आने के कारण मैंने अपना फेसबुक अकाउंट चला रखा था तभी मैंने किसी को फांसी का फंदा लगाते हुए देखा। उस वक्त वह फेसबुक पर अपने अंतिम उद्गार प्रकट कर रहा था। वह एक बड़े समूह से था अतः मुझे उसका नाम पता भी नहीं पता था। हां मुझे यह पता था कि मेरे सामने वह व्यक्ति अपनी जीवन लीला समाप्त करने जा रहा था। मेरे पास एक रास्ता तो यह था कि मैं उस पर बिल्कुल ध्यान ना दूं…. परंतु संवेदनशीलता के चलते मैंने उस वक्त की परिस्थितियों को देखते हुए उससे बातचीत करनी शुरू की। जीवन से निराश वह व्यक्ति लगातार जीवन से भागने की बात कर रहा था और मैं उसे यही समझाना चाह रही थी कि ऐसी कोई परिस्थिति नहीं जिससे वह निकल ना सके मैंने लगातार उसे एक घंटे जीवन से संबंधित विचार भेजें और अंततः उसने अपना मरने का विचार त्याग दिया। वह इंसान आज भी है और एक खुशहाल जिंदगी जी रहा है। तात्कालिक परिस्थितियों के चलते हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए क्योंकि हर रात की एक सुबह होती है।

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 प्रयत्नशील रहें….. परिस्थिति को स्वीकार कर लेना, धीरज बनाए रखना इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आप सामने बीमार पड़े व्यक्ति को अकेला उसके हाल पर छोड़ दें यदि आप स्वयं बीमार है तो अपना इलाज छोड़ दें, हो चुकी दुर्घटना से निकलने की कोशिश ही ना करें….. जैसी भी परिस्थिति हो उसके अनुसार प्रयत्न करें क्योंकि कहा गया है भगवान भी उनकी मदद करते हैं जो अपनी मदद स्वयं करते हैं।

4.

 उम्मीद….. कितने भी विषम परिस्थितियां हो यदि आप हौसला बनाए रखेंगे तो आप कैसी भी विकट परिस्थिति हो उस पर विजय प्राप्त कर लेंगे। कैसी भी परिस्थितियां हो.. जैसी आज है वैसी कल नहीं होगी और जैसी कल होगी वैसे आने वाले कल में नहीं होंगी यानी शनैैः-शनैः  बदलेगी इसलिए एकदम से लाचार हताश हो कर न बैठें। हर रात की सुबह होती है।

5. लोगों की बातों पर ना दें ध्यान…..

  बुरे वक्त में अधिकतर बहुत से लोग हमें सांत्वना देने आते हैं या हमारा दुख बांटने आते हैं। उस वक्त बहुत से ऐसे भी होते हैं जो हमारी बुरी परिस्थिति को ध्यान में रखकर तरह-तरह के किस्से बयान करते हैं। बेहतर है आप उनकी बातों पर ध्यान ना दें अपनी मानसिक शक्तियों को एकाग्र करें और एक चित्त होकर सोचे कि अब सामने कौन सी राह अपनानी है। अधीर होकर अर्जुन न बनें। अपने पूरे हौसले और ताकत को इकट्ठा करें और दोबारा आगे बढ़ने के लिए तैयार हों। ऐसी कोई परिस्थिति नहीं जिस पर मानव विजय ना प्राप्त कर सके।

चित्र गूगल से साभार….

VIAPriti Raghav Chauhan
SOURCEप्रीति राघव चौहान
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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