कुरुक्षेत्र धरोहर

हमने देखे छाज, हमने देखे छज्जे

हमने देखे ठाठ, हमने देखे ठठ्ठे

हमने देखे काठ के

कठौती और कठ्ठुए

बोहिये बनावण आली

बीरबानी देखी

चूड़ियाँ पहराण आली

लिछमी मनिहारी देखी

टोकनी को ठोकता

देखा है ठठेरा

बीन और पिटारी लिए

देखा है सपेरा

धौंकनी संग लुहार

चॉक चलाता कुम्हार

टमटम पे जाता

देखा है थानेदार

देखें हैं बड़े कुँए

और छोटी कुँइयाँ

नेजू डूबी बाल्टी

काढ़ती बिलैया

आले में माट

घर में ढेरों खाट

गुड़ की राब

और मीठी लाट

बैलगाड़ी, रेलगाड़ी

रेतीले खेत बाड़ी

नट देखे, सर्कस देखा

देखा बाईस्कोप

एंटीना वाला टी.वी. देखा

देखा टैलीस्कोप

चिट्ठी, तार और

देखे टेलीफोन

देखे बदलते रिश्ते

और नकली क्रोम

हमने देखा समय

धीरे-धीरे पिघलता,

रिश्तों में छिपा अपनापन

तकनीक में गलता।

फिर भी मन के किसी कोने से

आती है वो पुकार –

लौट चलो उस गाँव को

जहाँ माँ को छोड़ आए थे

करती इन्तज़ार…प्रीति राघव चौहान

VIAPritiraghavchauhan
SOURCEप्रीति राघव चौहान
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. एक रचनाकार सदैव अपनी कृतियों के रूप में जीवित रहता है। वह सदैव नित नूतन की खोज में रहता है। तमाम अवरोधों और संघर्षों के बावजूद ये बंजारा पूर्णतः मोक्ष की चाह में निरन्तर प्रयास रत रहता है। ऐसी ही एक रचनाकार प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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