उत्कर्ष

कालरात्रि और किरण का खूब हुआ विमर्श निशा किरण संघर्ष में नव-दिन का उत्कर्ष घोर निशा से उजियारे का जब जब होता संघर्ष तब- तब रश्मि रथी भानु का होता है उत्कर्ष @#प्रीति राघव चौहान

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प्रीति राघव चौहान उत्कर्ष 

प्रीति राघव चौहान
प्रीति राघव चौहान

PritiRaghavChauhan
प्रीति राघव चौहान

 

उत्कर्ष

 

 

कोलाहल चहुंओर व्याप्त है द्वंद चतुर्दिक घेरे

मैं और मैं की अमराई में निस दिन लगते फेरे

तू- तू मैं- मैं से भरकर नैया खेता सांझ सवेरे

निपट अकेलापन ले कहता कटें कष्ट नहीं मेरे

 

मनो विलास से आह्लादित मन मन के ऊंचे सूबे

दिशाहीन सा इत उत भागे इक पल को न ऊबे

लिए अतीत के तमगे बढ़ता अद्भुत अजब अजूबे

भार बढ़ रहा भाव नदारद अब डूबे तब डूबे

 

दिव्य खोज में लगा मौन घेरे हैं सहस्र विचार

ज्ञात जगत से आंख चुरा भीतर करता विस्तार

मत पूर्वाग्रह स्वार्थ सभी की गिरा बैठा दीवार

सहज भाव से भरा मनस खुले प्रेम के द्वार

 

कालरात्रि और किरण का खूब हुआ विमर्श

निशा किरण संघर्ष में नव-दिन का उत्कर्ष

घोर निशा से उजियारे का जब जब होता संघर्ष

तब- तब रश्मि रथी भानु का होता है उत्कर्ष

@#प्रीति राघव चौहान

 

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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. एक रचनाकार सदैव अपनी कृतियों के रूप में जीवित रहता है। वह सदैव नित नूतन की खोज में रहता है। तमाम अवरोधों और संघर्षों के बावजूद ये बंजारा पूर्णतः मोक्ष की चाह में निरन्तर प्रयास रत रहता है। ऐसी ही एक रचनाकार प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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