Monday, March 23, 2026
कुरुक्षेत्र धरोहर हमने देखे छाज, हमने देखे छज्जे हमने देखे ठाठ, हमने देखे ठठ्ठे हमने देखे काठ के कठौती और कठ्ठुए बोहिये बनावण आली बीरबानी देखी चूड़ियाँ पहराण आली लिछमी मनिहारी देखी टोकनी को ठोकता देखा है ठठेरा बीन और पिटारी लिए देखा है सपेरा धौंकनी संग लुहार चॉक चलाता कुम्हार टमटम पे जाता देखा है थानेदार देखें हैं बड़े कुँए और छोटी कुँइयाँ नेजू डूबी बाल्टी काढ़ती बिलैया आले में माट घर में ढेरों खाट गुड़ की राब और मीठी लाट बैलगाड़ी, रेलगाड़ी रेतीले...
कंचन सुबह से ही अपने महानगर वाले घर में तैयारियों में जुटी थी। बैठक कक्ष में उसने आसन, दरी और फूल सजा दिए थे। रंगीन परदों से छनकर आती धूप कमरे को और भी उजला बना रही थी। कोनों में रखे शो–पीस और मंदिर के पास की सजावट माहौल को पवित्र बना रही थी। हवन ठीक शाम चार बजे...
वृक्ष लगाओ, धरा बचाओ
अपराजिता जब पहली बार जब उस छ:फुटे पारिजात से मिली तो उसे लगा मानो वह किसी पुराने परिचित को देख रही हो। उसकी उपस्थिति में एक ऐसी शांति थी जो झील के मौन की तरह आत्मा तक उतर जाए। वह क्षण - क्षणभर का नहीं था, भीतर ही भीतर किसी नी उमंग के बीज के अंकुरित होने जैसा था। नीतू...
Gurugram
क्य बताऊँ किसलिए बेजार हूँ क्या बताऊँ किसलिए बेजार हूँ रोज के हालात से लाचार हूँ तरबतर हैं चप्पलें बरखा बगैर दुर्गंध से भरा हुआ बाजार हूँ मकानों में पैबस्त हैं नाले सभी उम्मीद से भरा हुआ त्योहार हूँ बड़े-बड़े मसले यहाँ का तौर हैं छोटे मुद्दों का नहीं दरबार हूँ मुकाबिल किसी रोज़ हो तो ज़रा मैं भी तेरा ही तो परिवार हूँ बदल रहा हूँ कबसे लिफाफों में तरोताजा...
कुछ, न पाने की कसक सब कुछ होने से ज्यादा है। चाँद समूचा खिड़की में  पर अंधकार से वादा है  मंज़िल पर आ बैठे हैं  प्यास मगर है राह की बाकी जो छूटा बस वो ही भीतर अजब अनकहा इक बैरागी  कुछ, न पाने की कसक सब कुछ होने से ज्यादा है, हर इच्छा का पूरा होना इक दलदल बन जाना है, बहने के यदि रस्ते न हो कमल नित नया खिलाना...
 यदि समाज में जड़ता है, ये जड़ता कौन मिटाएगा? किसकी ज़िम्मेदारी है ये, राहें कौन दिखाएगा? हर चॉक की रेख से पूछो, किसने दुनिया बदली है? हर पुस्तक के पृष्ठ से सुन लो, किसकी मेहनत झलकी है? यदि शिक्षक ही मौन रहेगा, तो दीपक कौन जलाएगा? किसकी जिम्मेदारी है……   ‘शब्द’ तुम्हारा बदले जीवन, तो क्यों थकना क्यों रुकना है।  हर ‘संवाद’ है नव आंदोलन,  प्रतिपल आगे बढ़ना है ज्ञान मशाल जो तुमने थामी आगे कौन...
योग एक दिवस नहीं सतत् की जाने वाली क्रिया है, जिसमें स्वयं को लगातार रखना होता है एकाग्र और स्थिर। श्वास की गति में लानी होती है समता चिंतन को निर्मल बनाना होता है। हर आसन में आत्मा की पुकार सुननी होती है, हर क्षण में जागरूकता को साधना होता है। यह शरीर का नहीं, मन, बुद्धि और आत्मा का अनुशासन है। योग तप है, योग प्रेम है, योग जीवन...
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