अलवर के शंभुनाथ
काश जात पूछ
करते वो प्रेम ....
निकले होते घर से
घर वालों से पूछ ...
चले होते लेकर
आज्ञा माता-पिता की ..
काश उन्हें पता होता
प्रेम...
Golden Bowl
Pritiraghav Chauhan सुनहरी कटोरा
“मम्मी, बुरा ना मानो तो एक चीज मांगू।” शादी के चार साल बाद नेहा ने माँ से कहा।
“हां बोल क्या चाहिए?”
“तुम...
नम आँखें मुस्कुराईं
दो परियाँ
हौले हौले उतर
जमीन पर आईं
नम आँखें माँ की
देख मुस्कुराईं
मुस्कुराहट कह रही थी
माँ दुखी तू हो ना
हम जहाँ करेंगे रोशन
आँचल को यूँ भिगो ना
इक...
सीढ़ी
सीढ़ी
“मुट्ठी में रखना, छूट दी… तो सर पर चढ़ कर नाचेगी!”, अहिल्या ने हाथ नचाते नचाते हुए श्रीधर से कहा।
“चिंता मत कर अम्मा, मैं...
वो चिड़िया
अब वो चिड़िया नहीं आती
जो आती थी कल तलक
शीशे के दर पर
जो पटकती थी सर
आइने से घर पर
अब वो चिड़िया नहीं आती
उसे अहसास है...
अमीना यदा कदा मुस्कुराती है
अमीना यदा कदा मुस्कुराती है
आज अमीना का दिन
शुरु हुआ प्रार्थना से
लेकर हाथ में
जादू का बक्सा
जिसे खोने का डर लिए
देख रही है वो सपने अविरल
बंद...
अरण्य-रोदन (भाग – 1 कठौती)
अरण्य-रोदन
भाग – 1
कठौती
रोज की भांति सड़क आज भी सीधी सपाट थी। कुछ भी ऐसा देखने लायक नहीं था जो किसी राहगीर...
माँ
तुम ही कुमारी
तुम ही किशोरी
तुम ही युवती
तुम ही हो यति
तुम ही दुर्गा
तुम ही शक्ति
तुम ही ब्रह्म हो
तुम...
Aaj ka vichar
जहालत इक सिफर है
निकलना है इससे
चलो मिलकर इन
स्याह तीलों को मिटाएँ
मंदिर मंदिर पंडे बैठे
मंदिर मंदिर बैठे पंडे
मंदिर बाहर बैठे वृद्ध
राम ढूंढते वन वन भटके
घर के ऊपर फिरते गिद्ध
खुशहाली को खुशी खा गई
सड़कों पर है बदहाली
दिल्ली से है...
मुंडकल्ली /without scarf on head
मुंडकल्ली
दरवाज़ो के पीछे हँसती खिलखिलातीं हैं
दहलीज़ के भीतर देखतीं हैं
सपने अंतरिक्ष के
घर से विद्यालय के रास्ते के सिवा नहीं देखा...
आज का विचार
वो सृष्टि है
वो वृष्टि है
नित नूतन
वो दृष्टि है
सिंदूरी रंग
टिकुली में ले
वो सम्पूर्ण
समष्टि है
प्रीति राघव चौहान
चित्रांकन :आरुषि चौहान
नृत्य /Dance
उसके कदम थिरकते हैं
माँ वृंदावन को जाती है
जैसे कबूतर मूंद कर आँखें
कर रहा हो इंतजार
अनहोनी टल जाने की
बंद उन...
गूंगी सड़क
टूटी हुई सड़कों पर
मुस्कुराते कर चलते हुए लोग
स्वच्छता अभियान की
धज्जियाँ उड़ाते हुए
सड़कों पर कूड़े के ढेर
ढेरों पर भिनभिनाती मक्खियाँ
चितकबरी गायों के झुंड
रेड लाइट जंप...
बोलो रानी/जीजिविषा
जीजिविषा रोज रचती है
आड़ी तिरछी लकीरों से
काले नीले लाल पीले
सतरंगी सुनहरे पल…
रास्तों की कालिख
धोने को हाथ हैं
मशीन भी...
मत रोको अब बह जाने दो
मत रोको अब बह जाने दो
एक समन्दर
मन के अन्दर
कतरा कतरा
कह जाने दो
मत रोको अब बह जाने दो
मन की...
























