वो आखिरी ख़त

जब छोड़ा शहर तेरा मैंने 

तेरा मन ही मन घबराना 

उस सर्पिल पगडंडी पर

तेरा पीछे पीछे आना

कैसे भूल मैं सकती हूँ 

वो नम राहें वो भारी दिन 

वो सर्द ठिठुरते मौसम में 

माथे पर पसीना ता धिन-धिन 

मेघों की उस शाला में 

वो गहन कुहासे की बूँदें 

जब सूर्यदेव भी सोए थे 

सुदूर कहीं आँखें मूंदे

घाटी में पसरा सन्नाटा

बस दो जन थे अनबोले से 

अधरों पर स्मित इतराया था

मन के कपाट कब खोले थे

वो पहला और अंतिम भी था 

जो ख़त तुमने पकड़ाया था

पल वो जैसे ठहर गया 

जब तुमने हाथ थमाया था

था ललाट वो झुका हुआ 

कर्ण लाल नेत्र बोझिल 

सुनसान वादियों में तेरा

वो पत्र थमा होना ओझल 

थी धरा शांत और गगन स्तब्ध 

उस रोज कहाँ खोए थे शब्द 

वो वापस जाती पदचापें

कितनी भारी कितनी निशब्द 

कैसे भूल मैं सकती हूँ 

वो खत अनबूझ पहेली सा

धुला हुआ सा वो कागज 

इक आशा नई नवेली सा

उस खत को लेकर कितने दिन 

कितनी रातें मैं भरमाई

उसकी सुधियों को लेकर 

कितनी सदियाँ बिसराईं

प्रतिउत्तर उस खत का 

देती भी तो देती क्या 

उसके प्रणयनिवेदन सी 

ना थी ह्रदय में गहराई 

“प्रीति राघव चौहान” 

VIAPRITI RAGHAV CHAUHAN
SOURCEप्रीति राघव चौहान
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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