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	<title>नई कहानी &#8211; Priti Raghav Chauhan</title>
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	<description>Priti Raghav Chauhan</description>
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		<title>उसका जाना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 17:02:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[HINDI]]></category>
		<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[#प्रीति राघव चौहान# उसका जाना #नई कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[कंचन सुबह से ही अपने महानगर वाले घर में तैयारियों में जुटी थी। बैठक कक्ष में उसने आसन, दरी और फूल सजा दिए थे। रंगीन परदों से छनकर आती धूप कमरे को और भी उजला बना रही थी। कोनों में रखे शो–पीस और मंदिर के पास की सजावट माहौल को पवित्र बना रही थी। हवन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left;">कंचन सुबह से ही अपने महानगर वाले घर में तैयारियों में जुटी थी। बैठक कक्ष में उसने आसन, दरी और फूल सजा दिए थे। रंगीन परदों से छनकर आती धूप कमरे को और भी उजला बना रही थी। कोनों में रखे शो–पीस और मंदिर के पास की सजावट माहौल को पवित्र बना रही थी। हवन ठीक शाम चार बजे होना तय था, इसलिए अभी कुछ घंटे बाकी थे।वह सोच रही थी कि सब मेहमान आने से पहले एक बार और सब देख ले—अग्निकुंड, घी, हवन सामग्री, कुश, अक्षत सब ठीक से रखा है या नहीं। तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर अनजान नंबर देखकर उसने हल्के मन से सोचा—शायद कोई परिचित आशीर्वाद देने का फोन कर रहा होगा। लेकिन जैसे ही कॉल रिसीव किया, आवाज़ सुनते ही उसका दिल धक् से रह गया।</p>
<p style="text-align: left;">            सरोज जी का फोन था। उधर से संदेश था—“कंचन जी, आप किसी आरव त्रिवेदी को जानती हैं?यहाँ कोई निशिकांत जी आएँ हैं। उनके पास रिटायर्ड और मृत व्यक्तियों की एक लिस्ट है। उनका एन.पी.एस. क्लेम परिवार को दिलाने के लिए उनका घर का पता चाहिए, और हमें जानकारी मिली है कि केवल आप ही जानते हैं।”</p>
<p style="text-align: left;">“एन पी एस…? वो तो अभी चालीस के ही होंगे!” कंचन ने अचंभे से कहा।</p>
<p style="text-align: left;"> “जी आरव त्रिवेदी का खाता बंद है, फोन कोई उठाता नहीं इसलिए ये बैंक से ये आए हैं। इन्हें उनके घर का पता और फोन नंबर चाहिए।” सरोज जी ने दुखी मन से कहा।</p>
<p style="text-align: left;">कुछ पलों के लिए उसके चारों ओर का शोर–शराबा, रंग, रोशनी सब मौन हो गए। सोफे पर रखे कुशन, फिश टैंक की हल्की रोशनी और दीवार पर टंगी पेंटिंग सब धुंधले से दिखने लगे। एक ओर शाम चार बजे का शुभ अवसर था, दूसरी ओर यह गहरी पीड़ा।कंचन फोन रखकर कुछ देर निःशब्द बैठी रही। मछलियों की धीमी तैराकी और पंखे की आवाज़ के बीच उसका मन भीतर तक भारी हो गया। घड़ी पर नज़र पड़ी—बारह बजकर बीस मिनट हो रहे थे। सिर्फ तीन घंटे चालीस मिनट में पंडितजी आने वाले थे और आँगन में हवन शुरू होना था।उसने गहरी साँस ली, आँसू रोकने की कोशिश की और खुद से कहा—“आरव जी के परिवार तक उनका अधिकार पहुँचना ही चाहिए।” वह जानती थी कि हवन की अग्नि प्रज्वलित होनी तय है , लेकिन उसके मन के भीतर शोक की लहर भी उतनी ही तीव्र थी।</p>
<p style="text-align: left;">आरव कभी उसके सहकर्मी रहे थे। उम्र तीस के आसपास, पर चेहरे पर हमेशा हँसी, बातों में बेबाक़ी और दिल में मदद करने का जज़्बा। वह जब भी उनके साथ होती, माहौल हल्का हो जाता।</p>
<p style="text-align: left;">उन दिनों की यादें उसे बार-बार घेर लेतीं।</p>
<p style="text-align: left;">वह दृश्य आज भी आँखों के सामने ताज़ा था—</p>
<p style="text-align: left;">“भाई गौतम, मैं तो एच.सी.एस. का फ़ार्म भर रहा हूँ, तू भी भर यार…”</p>
<p style="text-align: left;">गौतम झुँझलाया, “मेरे पास कहाँ इतना समय है, और कैसे मैं…। ”</p>
<p style="text-align: left;">वह अचानक बीच में बोल पड़ी,</p>
<p style="text-align: left;">“मैं भी भरूँगी फ़ार्म!”</p>
<p style="text-align: left;">आरव की हँसी फूट पड़ी। वह ठठाकर बोला,</p>
<p style="text-align: left;">“वाह जी वाह ! बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम…”</p>
<p style="text-align: left;">“अच्छा तुमने मुझे बुड्ढी बोला। !”</p>
<p style="text-align: left;">उसकी आँखों में गुस्से की झलक थी,</p>
<p style="text-align: left;">“मैं बुड्ढी हूँ? ठीक है, अगर तुमसे ज्यादा नंबर न आए तो कहना।”</p>
<p style="text-align: left;">“चलो, लगी शर्त!”आरव की आँखें चमक उठीं।</p>
<p style="text-align: left;">“हाँ हाँ, चलो लगी शर्त! यही तो मज़ा है ज़िंदगी का।”</p>
<p style="text-align: left;">शर्त के चक्कर में उसने भी, पैंतालीस की उम्र में, फ़ार्म भर दिया। सब हँसते रहे, मगर आरव का यही अंदाज़ था—किसी भी बात को चुनौती और उत्साह में बदल देना।</p>
<p style="text-align: left;">उसकी यह आदत, “चलो, लगी शर्त…” कहना, सहकर्मियों के बीच मशहूर थी। ऑफिस में किसी ने कहा कि काम मुश्किल है, तो वह ठहाका लगाकर बोलता—“ठीक है, चलो लगी शर्त, तुमसे पहले मैं निपटाऊँगा।”</p>
<p style="text-align: left;">उसकी शर्तें कभी पैसे की नहीं होतीं, सिर्फ़ आत्मविश्वास और दोस्ती की होतीं।</p>
<p style="text-align: left;">कभी-कभी हँसी में, कभी चुनौती में, मगर हर बार दिल से।</p>
<p style="text-align: left;">याद करते हुए वह सोचने लगी—</p>
<p style="text-align: left;">&#8220;कैसा आदमी था… मुँहफट ज़रूर, पर दिल का बिल्कुल साफ़। उसकी मौजूदगी ने ही कई बार मुझे आगे बढ़ने का हौसला दिया।&#8221;एक बार तो चलती गाड़ी से….</p>
<p style="text-align: left;">उसकी छोटी-सी आल्टो पर उसे एक अजीब-सा अभिमान था। उन दिनों साधनों की कमी थी, सो हम चारों—गौतम, मैं, मंजू और रंजना—उसी गाड़ी में सफ़र किया करते थे।</p>
<p style="text-align: left;">उस दिन जब उसने रंजना को घर के पास उतारा, तो अचानक झुँझलाकर बोला,</p>
<p style="text-align: left;">“अब इस मोटी को साथ नहीं ले जाऊँगा।इतनी भारी है हर ब्रेकर पर गाड़ी टिकती है। ”</p>
<p style="text-align: left;">उसकी आवाज़ में ऐसी कड़वाहट थी कि मेरा मन कसैला हो गया। वातावरण भारी-सा हो गया था। तभी मंजू ने बात को हल्का बनाने के लिए मुस्कुरा कर कहा—</p>
<p style="text-align: left;">“सर, मुझे मत छोड़ना… मैं तो पतली-सी हूँ।”</p>
<p style="text-align: left;">मैंने सोचा, शायद वह बात यहीं खत्म हो जाएगी। लेकिन अगले दिन न मंजू को जगह मिली, न रंजना को। हम दोनों हैरान थे। हिम्मत जुटाकर मैंने पूछा—</p>
<p style="text-align: left;">“क्या वजह है कि आज इन्हें नहीं लाए?”</p>
<p style="text-align: left;">वह रुक गया, आँखों में तिरस्कार की लकीरें खिंच आईं। ठंडी साँस छोड़ते हुए बोला—</p>
<p style="text-align: left;">“जो बेस्ट फ्रेंड होकर भी उसे धोखा दे रही है… ऐसी औरत का मेरे साथ क्या काम? मैं ऐसे रिश्ते ढोना नहीं चाहता।”</p>
<p style="text-align: left;">उसकी बातों में कठोरता थी, लेकिन कहीं न कहीं चोट भी झलक रही थी।</p>
<p style="text-align: left;"> छोटी उम्र में ही आरव के सिर से पिता का साया उठ गया था। गाँव की बटाई की ज़मीन ही सहारा थी। माँ ने उसी से आने वाले पैसों पर किसी तरह घर चलाया और आरव व निलय को पाला-पोसा। खेत से अनाज आता, तो माँ उसे सोने-चाँदी की तरह सँभालती।</p>
<p style="text-align: left;">आरव ने पढ़ाई में जी-जान लगा दी। उसका सपना था कि एक दिन माँ के संघर्ष को कुछ राहत मिले। निलय छोटा था, इसलिए माँ अक्सर कहतीं—</p>
<p style="text-align: left;">“बड़े बेटे का कर्तव्य है कि घर का सहारा बने।”</p>
<p style="text-align: left;">इधर आरव की मेहनत रंग लाई। पहली नौकरी मिली। पहली तनख़्वाह के सपने उसने पहले ही बाँध रखे थे—माँ के लिए साड़ी, निलय के लिए जूते और घर के लिए नया रेडियो।लकिन किस्मत जैसे हाथ धोकर उसके पीछे पड़ी थी। नौकरी शुरू हुए अभी तीन महीने ही बीते थे कि अचानक रेल दुर्घटना में माँ चल बसीं।जब तीन महीने बाद आरव को पहली तनख्वाह मिलीतो कैसे फफक कर रोया था? नोटों को हाथ में थामकर जब उसने कहा था—</p>
<p style="text-align: left;">“माँ, ये पैसे तो आपके लिए थे… अब मैं किसे दूँ?”</p>
<p style="text-align: left;">कैसे कठिन हालात में भी आरव ने सबको संभाला था।</p>
<p style="text-align: left;">सोचकर ही उसके गले में रुकावट आ गई।</p>
<p style="text-align: left;">वो मैनेजर नाजरीन को मम्मी जी कहता था था.. उसके आने के बाद स्टॉफ में नोक झोंक बढ़ गई थी। एक तो उम्र कम दूसरा पारा हाई…  कंचन जानती थी कि जीवन इसी द्वंद्व से भरा है—कभी मंगल की ध्वनि, तो कभी मृत्यु का मौन। आज कंचन के लिए सबसे कठिन कार्य यही था कि वह अपने आँसुओं को रोककर, आरव के परिवार को उनका हक़ दिलाने की राह बनाए।उसके हाथ काँपते हुए भी श्रद्धा से जुड़ गए—“आरव जी की आत्मा को शांति मिले।”</p>
<p style="text-align: left;">     “क्या करूँ? अभी रोने बैठ जाऊँ तो पूरा वातावरण बदल जाएगा।1 लेकिन आरव जी का परिवार इंतज़ार कर रहा होगा, उनकी मदद सिर्फ मैं ही कर सकती हूँ।”</p>
<p style="text-align: left;">कंचन ने अपने आँसुओं को समेटा और डायरी निकाली। पन्ने पलटे और उस पर आरव त्रिवेदी का घर का पता कहीं नहीं लिखा था । हाँ उसका फोन नंबर जरूर था। उसने तुरंत नंबर डायल किया… फोन पर इनकमिंग उपलब्ध नहीं थी। उसने की बार नंबर डायल किया किंतु नतीजा ढाक के तीन पात। उसने फोन करके अधिकारी को सारी जानकारी दी और साथ ही यह भी कहा—“मैं उनके घर जाकर उन्हें आपका नंबर दूंगी। कृपया सुनिश्चित कीजिए कि उनके परिवार तक यह मदद तुरंत पहुँचे।”हवन में तीन घंटे शेष थे। कंचन ने तुरंत चंद्रलोक के लिए ऊबर बुक की और पंद्रह मिनट में आरव के घर पहुँच गई।</p>
<p style="text-align: left;">दरवाज़ा नीरजा ने खोला। उसकी आँखें बोझिल थीं—नींद से या ग़म से, कंचन समझ न पाई।</p>
<p style="text-align: left;">“आइए दीदी,” नीरजा ने थके स्वर में कहा।</p>
<p style="text-align: left;">कंचन ने भीतर कदम रखते हुए पूछा, “आरव तो ……”</p>
<p style="text-align: left;">“हाँ, सुनकर ही तो आई हूँ,” उसने आह भरते हुए कहा, “उसके जीवन में कितने कष्ट लिखे थे—पहले पिता जी, फिर माँ और अब…”</p>
<p style="text-align: left;">नीरजा बात बदलने लगी, “दीदी, मैं चाय बनाती हूँ। बस स्कूल से लौटकर अभी आँख लगी थी… बच्चे डे-बोर्डिंग में हैं।”</p>
<p style="text-align: left;">कंचन ने उसे गौर से देखा। हाथों में कड़े और अंगूठी तो सामान्य थे, मगर पैरों में बिछिया और माँग में सिंदूर देखकर उसका मन सिहर उठा।</p>
<p style="text-align: left;">“आरव को गए अभी कुछ समय हुआ है और ये…” कंचन का मन तिरस्कार के भावों से भर गया।</p>
<p style="text-align: left;">“ये सिन्दूर…”</p>
<p style="text-align: left;">चाय की ट्रे रखते ही कंचन ने अचानक पूछ लिया…</p>
<p style="text-align: left;">“ये तो रवि काशी से लाया था न? ओह! तुम रवि के साथ…”</p>
<p style="text-align: left;">नीरजा ने एक क्षण को उसकी ओर देखा और फिर हल्की-सी हँसी के साथ बोली—</p>
<p style="text-align: left;">“हाँ दीदी, रवि नहीं तो कौन? ।”</p>
<p style="text-align: left;">कंचन का दिल बैठ गया। तो ये बात है… आरव की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई और यह औरत रवि में रम गई!</p>
<p style="text-align: left;">अगले आधे घंटे तक नीरजा उत्साह से रवि की बातें करती रही। कभी हँसती, कभी उसकी शरारतों का ज़िक्र करती, कभी पुरानी यादें ताज़ा करती। कंचन को हर शब्द हथौड़े की तरह लगता—</p>
<p style="text-align: left;">कैसी औरत है ये! पति गया और ये किसी और के संग हँसी ठिठोली में डूबी है।</p>
<p style="text-align: left;">जीवन भी कैसा बेमानी लगता है… आजकल इंसान को बदलते देर ही कहाँ लगती है।</p>
<p style="text-align: left;">कंचन का मन भारी था। सोच रही थी—आरव ने क्या कुछ नहीं किया इस घर को सँवारने में। बचपन से ही संघर्ष, फिर नौकरी, फिर परिवार की ज़िम्मेदारी… एक-एक ईंट जोड़कर उसने यह घर खड़ा किया थाऔर अब?यह औरत, जिसे उसने अपनी जीवनसंगिनी कहा, वही सबकुछ तिरोहित कर किसी और राह पर निकल पड़ी।</p>
<p style="text-align: left;">कंचन की आँखों के सामने इतिहास की परछाइयाँ उभरीं।</p>
<p style="text-align: left;">&#8220;कहाँ पहले पद्मावती सरीखी नारियाँ होती थीं—जो पति की प्रतिष्ठा के लिए प्राणों की आहुति तक दे देती थीं। और कहाँ आज की औरतें… जो ज़रा-सी तन्हाई और मोहभंग! पल भर में परपुरुष गामी हो जाती हैं।&#8221;उसका मन भीतर ही भीतर काँप गया।</p>
<p style="text-align: left;">&#8220;क्या यही है आधुनिकता? क्या यही है औरत की आज़ादी? पति की मेहनत, उसके संघर्ष, उसके सपनों की कोई क़ीमत नहीं? एक दिन में रिश्ते बदल जाते हैं, और ज़माने की नज़रों में यह सब सामान्य कहलाता है।&#8221;</p>
<p style="text-align: left;">कंचन की आँखें नम थीं। उसे लग रहा था मानो आरव का जीवन भर का परिश्रम, उसकी संवेदनाएँ, सब व्यर्थ हो गए।कमरे की दीवारें चुप थीं, पर कंचन का मन चीख रहा था—</p>
<p style="text-align: left;">&#8220;कभी इंसान रिश्तों का पर्याय हुआ करता था, और आज… बस मौक़ापरस्ती का।ऐसी औरत को एन पी एस मिलना चाहिए क्या? &#8220;</p>
<p style="text-align: left;">तभी घर का दरवाज़ा खुला और निलय भीतर आया।</p>
<p style="text-align: left;">“भाभी, रवि है क्या?” उसने उत्सुकता से पूछा।</p>
<p style="text-align: left;">नीरजा मुस्कुराई, “नहीं, वो तो बाज़ार गए हैं नवरात्रि का सामान लाने।”</p>
<p style="text-align: left;">देवर-भाभी के बीच छोटी-सी बात पर ठहाका गूँज उठा।</p>
<p style="text-align: left;">कंचन का दिल और डूब गया। “ये हँसी… ये नज़दीकियाँ… क्या अब यही रिश्तों का नया रूप है?”</p>
<p style="text-align: left;">लेकिन तभी आरव दरवाज़े से भीतर आया।</p>
<p style="text-align: left;">उसी मस्तमौला पन से कहा-</p>
<p style="text-align: left;">“अरे भाई तू कब आया? ,” उसने कहा।</p>
<p style="text-align: left;">निलय ने हँसकर कहा—”रवि कहकर तो जाता। मुझे भी लाना था सामान।”</p>
<p style="text-align: left;">“अरे भाई फिक्र किस बात की जब तेरा भाई बैठा है। नीरू ने बता दिया था नीता का भी सामान लेते आना।” आवाज में वही बेबाकी थी।</p>
<p style="text-align: left;">“रवि…. आरव तुम!”</p>
<p style="text-align: left;">कंचन का मन शर्म और राहत से भर उठा। जो कुछ उसने सोचा था, वह सब भ्रम निकला। नीरजा के चेहरे की थकान मोहब्बत और ज़िम्मेदारी का बोझ था, न कि किसी और के साथ जुड़ाव का।</p>
<p style="text-align: left;">“दीदी आप यहाँ…?”</p>
<p style="text-align: left;">“वो एन पी एस के लिए…. आफिस से फोन आया था।”</p>
<p style="text-align: left;">“ओह! ये बैंक वालों ने भी दुखी कर लिया। जब से दिल्ली आया टाइम ही नहीं मिला कि एन पी एस मर्ज कराऊँ। पर आप क्यों परेशान हुई? मुझे बुलाया होता।”</p>
<p style="text-align: left;">“पर तुम्हारा फोन….!”</p>
<p style="text-align: left;">“फोन खराब हो गया था नया नंबर ले लिया…… ऽऽऽऽ”</p>
<p style="text-align: left;">कंचन ने घड़ी पर नजर डाली साढ़े तीन बज रहे थे। फिर मिलेंगे आरव जरा जल्दी में हूँ। बस मेरे फोन पर अपना नंबर भेजना… बाकी बातें बाद में…..</p>
<p style="text-align: left;">आरव को समझ नहीं आया कि कंचन को क्या हुआ?</p>
<figure id="attachment_2786" aria-describedby="caption-attachment-2786" style="width: 640px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका जाना-प्रीत-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000.jp"><img loading="lazy" class="size-large wp-image-2786" src="https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-726x1024.jpg" alt="" width="640" height="903" srcset="https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-726x1024.jpg 726w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-213x300.jpg 213w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-768x1083.jpg 768w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-1090x1536.jpg 1090w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-696x981.jpg 696w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-1068x1506.jpg 1068w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000-298x420.jpg 298w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/उसका-जाना_20251006_222438_0000.jpg 1240w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-2786" class="wp-caption-text">जो लोग दिल के करीब होते हैं कभी दूर नहीं जाते&#8230;</figcaption></figure>
<p style="text-align: left;">
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		<title>पारिजात</title>
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		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 16:21:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[Pritiraghavchauhan.com पारिजात]]></category>
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					<description><![CDATA[अपराजिता जब पहली बार जब उस छ:फुटे पारिजात से मिली तो उसे लगा मानो वह किसी पुराने परिचित को देख रही हो। उसकी उपस्थिति में एक ऐसी शांति थी जो झील के मौन की तरह आत्मा तक उतर जाए। वह क्षण &#8211; क्षणभर का नहीं था, भीतर ही भीतर किसी नी उमंग के बीज के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>अपराजिता जब पहली बार जब उस छ:फुटे पारिजात से मिली तो उसे लगा मानो वह किसी पुराने परिचित को देख रही हो। उसकी उपस्थिति में एक ऐसी शांति थी जो झील के मौन की तरह आत्मा तक उतर जाए। वह क्षण &#8211; क्षणभर का नहीं था, भीतर ही भीतर किसी नी उमंग के बीज के अंकुरित होने जैसा था।</p>
<p>नीतू ने हौले से हँसकर कहा—</p>
<p>“तो यही हैं वे, जिनके बारे में सुना था… सत्यभामा जैसी प्रखर नारी भी जिनकी वजह से ईर्ष्या के जाल में उलझ गई थी।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अपराजिता चुप रही। उसका मौन ही उसकी स्वीकृति था।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ये पारिजात कोई साधारण रंगरूप वाला इकलखुरा न था। इसके आने से जैसे वातावरण में फूलों की गंध घुल जाती थी। उसके आसपास बैठने वाले सभी सत्तर पात्र मानो पृष्ठभूमि में धुंधला जाते और केंद्र में बस वही रह जाता।</p>
<p>सेल्फ़ियों और लाइक्स की भीड़ में पारिजात की सहजता अलग दिखाई देती थी—जैसे उसे बाहरी शोहरत की परवाह ही न हो।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अपराजिता ने उसी दिन से अपने मन के गुप्त कोनों में पारिजात का नाम अंकित कर लिया। उसे न मालूम था कि यह आकर्षण प्रेम है या किसी अनजाने बंधन का स्मरण। वह बस यह जानती थी कि अब उसकी हर सुबह पारिजात के विचार से शुरू होगी। उसने कहीं सुना था पारिजात को आलिंगन में लेने से सारे दर्द तिरोहित हो जाते हैं। अपने साथियों में सबसे बड़ी वय का वही था।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अपराजिता जब पारिजात को अपने संग लाई तो अकेली नहीं थी। उसकी आँखों में जो चमक थी, वही झिलमिलाहट उसकी कक्षा की आठ बालिकाओं की हँसी में भी झलक रही थी। वे सब जैसे किसी अनदेखे उत्सव का हिस्सा बनी हों।पारिजात जब उनके बीच आया तो लगा जैसे कोई राग स्वयं चल पड़ा हो। उसके हर कदम के साथ बालिकाएँ ताल में झूमने लगीं। आठों बालिकाएँ गोल घेरे में थिरकतीं और पारिजात के साथी विष्णु कांता, अशोक, नयनतारा तिकोमा, डेजी, चम्पा, कदम्ब, पिलखन, कटहल डालियों जैसे वृक्ष की तरह लहराते चले आए थे ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नीतू दूर खड़ी इस दृश्य को निहार रही थी—</p>
<p>“यह तो साधारण उत्सव नहीं है,” उसने सोचा,</p>
<p>“यह तो किसी नूतन युग का आरंभ है।”पारिजात और उसके सत्तर साथियों का जब विद्यालय में आगमन हुआ तो नज़ारा अद्भुत था।</p>
<p>द्वार से लेकर आख़िरी चारदीवारी तक बच्चों ने फूल-पत्तियों की रंगोली बिछा दी।</p>
<p>अभिनंदन का यह उत्साह देख लगता था जैसे किसी राजनेता का चुनावी रोड शो हो रहा हो।कक्षा चौथी के बच्चों ने सबसे पहले सैल्फ़ी ली।</p>
<p>गंभीर ज्ञान की किताबें एक ओर, मोबाइल कैमरे चमकते हुए दूसरी ओर!</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>रोहन बोला—</p>
<p>“मैम, पारिजात को बीच में खड़ा कीजिए, वरना हमारी डीपी में बराबर नहीं आएंगे।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>शैली ने टोका—</p>
<p>“अरे! पहले मेरा क्लिक करो, वरना ये फिर से हिल जाएंगे।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ऐसा लग रहा था मानो गणित की कक्षा रद्द हो गई हो और फोटोग्राफ़ी की प्रैक्टिकल क्लास चल रही हो।सभी बच्चे इतने खुश थे मानो लाइक्स और हार्ट की फसल यहीं विद्यालय की ज़मीन पर उगाई जा रही हो।</p>
<p>अपराजिता ने पारिजात से धीरे से कहा—</p>
<p>“देखो, ये वो पीढ़ी है जो पाठ याद न करे तो चलेगा,</p>
<p>पर सैल्फ़ी में स्माइल करना नहीं भूलेगी।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नीतू ने तंज कसा—</p>
<p>“आजकल बच्चों का सबसे बड़ा ग्रंथ है—मोबाइल गैलरी।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>बालिकाएँ हाथों में छोटे-छोटे पौधों के पैकेट लिए थीं, जो हवा में लहर- लहर लहरा रहे थे । हर एक बालिका की चोटी पर गूँथे हुए फूल ऐसे लगते मानो स्वयं वसंत ने उन्हें सँवारा हो।</p>
<p>पारिजात जब उनके बीच आया तो लगा जैसे कोई राग स्वयं चल पड़ा हो। उसके हर कदम के साथ बालिकाएँ ताल में झूमने लगीं। आठों बालिकाएँ गोल घेरे में थिरकतीं और पारिजात के साथी बालिकाओं की हथेलियों में लहराते चले आए थे।</p>
<p>गड्ढे पहले ही तैयार थे। सभी पौधे यथास्थान लगा दिए गए।</p>
<p>“दिन का अंत आते-आते रंगोली की पंखुड़ियाँ मुरझा गईं,</p>
<p>पर बच्चों के चेहरों की मुस्कान जस की तस थी।</p>
<p>क्योंकि उनके पास अब ढेरों सैल्फ़ियाँ थीं—</p>
<p>जिन्हें देखकर वे बार-बार कहेंगे—</p>
<p>“ये हैं हमारे पारिजात जी,</p>
<p>जिन्होंने हमें होमवर्क से भी ज़्यादा लाइक्स दिलाए।”</p>
<p>सारा विद्यालय पारिजात और उसके सत्तर साथियों की सैल्फ़ियों में डूबा रहा।</p>
<p>हर बच्चा अपने मोबाइल की स्क्रीन चमकाकर गर्व से कह रहा था—</p>
<p>“देखो, यही है हमारा हीरो!”</p>
<p>महीने भर झमाझम बरसात हुई। पारिजात के साथियों ने जड़ें जमा लीं। कुछ तो गाँव के सुदूर घरों में बिना पैर जा पहुंचे। पीछे सिर्फ गड्ढे छोड़ गए। जिन्हें देख अपराजिता याद करती रह गई कि यहाँ छोटा पारिजात था या कटहल…..</p>
<p>पर तभी सच्चाई सामने आई—</p>
<p>प्रतियोगिता का नाम तो था “एक पेड़ माँ के नाम”!</p>
<p>और उन तमाम तस्वीरों में माँ का नामोनिशान नहीं था।</p>
<p>बस पारिजात खड़ा मुस्कुराता रहा, मानो वह ही सारी दुनिया की माँ हो।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>जैसे ही यह खुलासा हुआ, विद्यालय में हड़कंप मच गया।</p>
<p>दूसरी पारी के बड़े बच्चों ने तुरंत मोबाइल उठाया और बोले—</p>
<p>“अरे! जल्दी से अपनी मम्मी को बुलाओ, वरना अवार्ड हाथ से निकल जाएगा।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>बारह बजने को थे।</p>
<p>किसी की माँ सब्ज़ी लेकर बाज़ार से,</p>
<p>किसी की माँ दुपट्टा सँभालते हुए खेतों से भागती हुई आईं।कितनी अपने घर में जरूरी कार्य छोड़ कर आईं।</p>
<p>आनन-फ़ानन में गेट पर भीड़ लग गई</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अब हर बच्चा अपनी माँ को बग़ल में खड़ा कर कह रहा था—</p>
<p>“मम्मी, ज़रा मुस्कुरा दीजिए… पारिजात के साथ साइड में आइए।”</p>
<p>माएँ भी हाँफते-हाँफते कैमरे की ओर देखने लगीं।</p>
<p>फिर से फ्लैश चमके,</p>
<p>फिर से गैलरी भरी।</p>
<p>पर इस बार बच्चे तसल्ली से बोले—</p>
<p>“अब सही है!</p>
<p>माँ भी आ गईं, पारिजात भी दिख रहा है—</p>
<p>और प्रतियोगिता का मक़सद भी पूरा।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अपराजिता ने झुंझलाकर कहा—</p>
<p>“हमारे सारे पौधे तो इन्होंने कैप्चर कर लिए! अब हम क्या करेंगे?”</p>
<p>ऋतु मैम ने हँसते हुए उत्तर दिया—</p>
<p>“करना क्या है! इनकी माताओं को बुलाओ अभी। वही खड़ी होंगी तो फोटो भी सही कहलाएगा।”</p>
<p>अपराजिता फिर भी परेशान—</p>
<p>“पर इनके साथ तो सैंकड़ों फोटो हो गईं!अच्छा, आप ही बता दीजिए मैम, कब तक यह खत्म करना है?”</p>
<p>अपराजिता ने पूछा।</p>
<p>ऋतु मैम ने पूरी गंभीरता से कहा—</p>
<p>“2 अक्तूबर तक।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सब चौंक गए।</p>
<p>किसी को समझ ही नहीं आया कि पौधे का रिश्ता अब गांधी जयंती से कैसे जुड़ गया।</p>
<p>फिर अपराजिता मैम ने अपने चिर-परिचित “सरल उपाय” वाला अंदाज़ अपनाया—</p>
<p>“देखो, चिन्ता मत करो। सत्तर पौधे और सही। बच्चों को लाकर दोबारा दे देंगे।</p>
<p>उन्हें कहेंगे—घर पर लगाओ और सैल्फ़ी भेज दो।</p>
<p>बस! समस्या खत्म।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>विद्यालय के गेट पर नया बैनर टाँग दिया गया—</p>
<p>“वार्षिक आयोजन : 2 अक्तूबर, सेवा पखवाड़ा”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अपराजिता ने मुस्कुराकर पारिजात से कहा—</p>
<p>“लगता है अब हमें फूल कम और पोज़ ज़्यादा देने होंगे।</p>
<p>माँ के नाम पौधे लगाने का सपना,</p>
<p>अब ‘फिल्टर’ और ‘हैशटैग’ में ही खिलेगा।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नीतू ने जोड़ा—</p>
<p>“सच है, 2 अक्तूबर अब गांधीजी का नहीं,</p>
<p>गैलरी जी का दिन हो गया है।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अगले दिन के अखबारों की मुख्य खबर थी…</p>
<p>संपादकीय</p>
<p>“2 अक्तूबर :पारिजात सैल्फ़ी दिवस”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>प्रिय पाठको,</p>
<p>इस वर्ष हमारे यहाँ के शुभम करोतू विद्यालय ने इतिहास रच दिया।पौधारोपण के शुभअवसर पर फसल काटी सैल्फ़ियों की।सबसे ज्यादा वृक्ष पारिजात के लगाए गए।</p>
<p>एक पारिजात की तीन सौ साठ डिग्री के एंगल से सैंकड़ों फोटो ली गईं। खुशी की बात ये है कि इस पारिजात की सैंकड़ों माताएँ हैं।</p>
<p>गांधीजी मुस्कुरा रहे होंगे, सोचते हुए—</p>
<p>“अच्छा हुआ मेरे ज़माने में स्मार्टफोन न था,</p>
<p>वरना सत्याग्रह की जगह सैल्फ़ीग्रह हो जाता।”</p>
<p>और इस तरह…..</p>
<p>गाँव के बुज़ुर्ग चौपाल पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे।पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था—</p>
<p>“2 अक्तूबर : गांधी जयंती या सैल्फ़ी दिवस?”</p>
<p>बुज़ुर्गों की टिप्पणी</p>
<p>रामलाल काका ने चश्मा उतारकर कहा—</p>
<p>“अरे भाई, हमने तो सोचा था बच्चे पेड़ लगाएँगे, छाँव देंगे,</p>
<p>मगर यहाँ तो पेड़ से ज़्यादा फोटो उग रहे हैं!”</p>
<p>दूसरे बुज़ुर्ग बोले—</p>
<p>“पहले पौधे जड़ पकड़ते</p>
<figure id="attachment_2782" aria-describedby="caption-attachment-2782" style="width: 300px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000.jp"><img loading="lazy" class="size-medium wp-image-2782" src="https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-300x169.jpg" alt="वृक्ष लगाओ, धरा बचाओ" width="300" height="169" srcset="https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-300x169.jpg 300w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-1024x576.jpg 1024w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-768x432.jpg 768w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-1536x864.jpg 1536w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-2048x1152.jpg 2048w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-696x392.jpg 696w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-1068x601.jpg 1068w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2025/10/पारिजात-प्रीति-राघव-चौहान-_20251006_214725_0000-747x420.jpg 747w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-2782" class="wp-caption-text">पारिजात</figcaption></figure>
<p>थे, अब तो बस मोबाइल में ही फलते-फूलते हैं।</p>
<p>पता नहीं ये बच्चे आने वाली पीढ़ी को ऑक्सीजन देंगे या लाइक और कमेंट।”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>पिता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jun 2020 02:28:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[pritiraghavchauhan. com]]></category>
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					<description><![CDATA[पिता एक छत की तरह होता है जैसे सुनते आए हैं देखा भी है। पिता के पास अपार संभावनाओं का थैला होता है जो तमाम उम्र के बच्चों पर लुटाने के बाद भी खत्म नहीं होता। पर राकेश के सर से ये छत होते हुए भी नारद था। उसके पिता का थैला बंजारन चुड़ैल की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">पिता एक छत की तरह होता है जैसे सुनते आए हैं देखा भी है। </span><span style="vertical-align: inherit;">पिता के पास अपार संभावनाओं का थैला होता है जो तमाम उम्र के बच्चों पर लुटाने के बाद भी खत्म नहीं होता। </span><span style="vertical-align: inherit;">पर राकेश के सर से ये छत होते हुए भी नारद था। </span><span style="vertical-align: inherit;">उसके पिता का थैला बंजारन चुड़ैल की मुट्ठी में कैद था। </span><span style="vertical-align: inherit;">जिस उम्र में बच्चे अपने पिता के जूतों में पैर फंसाकर खिलखिलाते हैं वो उम्र नन्हे राकेश ने माँ के साथ कोर्ट, थाने, कचहरियों के चक्कर लगाते हुए दी। </span><span style="vertical-align: inherit;">चालीस किलो की अशिक्षित माँ &#8230; तिसपर छोटा भाई अलग &#8230;</span></span></p>
<p style="padding-left: 40px;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">           बाप को बंजारन चुड़ैल जो हरफनमौला थी उसकी कंपनी में मिली और लोकलाज से दूर उसके अपने ही घर में आ डटी। </span><span style="vertical-align: inherit;">गाँव वालों के कहने सुनने पर डायन उसके पिता को ले सात घर दूर जा बसी । </span><span style="vertical-align: inherit;">पिता के थैले के सभी मोती उस चूड़ैल की भेंट चढ़ते रहे और राकेश अपने ही गाँव में बेचारगी की पौध सा बढता गया। </span><span style="vertical-align: inherit;">पढ़ाई में सबसे आगे &#8230;. उसके स्कूल में उसकी टक्कर का दूसरा कोई न था।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">     जबसे अॉनलाइन शिक्षा का चलन आया राकेश को मोबाइल फोन की आवश्यकता आन पड़ी। </span><span style="vertical-align: inherit;">अबकी बार वह नौवीं कक्षा में आ गया था। </span><span style="vertical-align: inherit;">विद्यालय से सारा कार्य जो मोबाइल पर हो रहा था।पढ़ाई से दूरी उसकी विकलता को बढ़ा रही थी।</span></span></p>
<p><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">              पांच बाई पांच की कोठरी में चल रही चूड़ी बिन्दी की दुकान भी मुनाफा नहीं दे रही थी। </span><span style="vertical-align: inherit;">महीने भर में एक के बाद एक हुई दो तीन जवान मर्दों की मौत ने मौहल्ले भर की औरतों को बेवा का सा पैरहन जो पहना दिया था। </span><span style="vertical-align: inherit;">गाँव और शहर की मौतों में यही तो फर्क होता है, जहाँ शहरों में महीन मेकअप में लिपी पुती मूक संवेदना व्यक्त करते हुए एक बार में ही अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लौट जाती हैं मौहल्ले वालियाँ वहीं गाँव वालियाँ मैले -कुचैले घूंघट में दहाड़ मार कर रोती हैं। हैं। </span><span style="vertical-align: inherit;">जिसका गया वो तो बेवा होता ही है; आस पास की हमजोलिनों से ले दादी, नानी, चाची, बहनें, बूआ सबकी सब सूजी आंख और पकौड़े सी नाक के लिए बेश्रंगार महीने भर बैठी रहती हैं।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">        राकेश अपने पड़ोस के ऐसे ही एक बुरे वक्त में भाग भाग कर चाय पानी पकड़ाने का कार्य कर ही रहा था कि बाबा रामफल का टिकटिकिया फोन बज उठा। </span><span style="vertical-align: inherit;">राकेश ने दौड़कर बाहर सड़क पर बिछी दरी पर बाबा को फोन पकड़ाया। </span><span style="vertical-align: inherit;">रामफल ने फोन पर हौले से &#8216;हेल&#8217; बोला। </span><span style="vertical-align: inherit;">उसकी सारी शक्ति तो उसके बेटे सुमेर संग चार तीन साल पहले ही चली गई थी।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;हाँ जी, मैडम जी .. मैं शगुन का बाबा ..&#8221;। </span><span style="vertical-align: inherit;">कहते हैं भर्रा गया रामफल की आवाज। </span><span style="vertical-align: inherit;">राकेश ने मौके की नजाकत को समझ बाबा से फोन ले लिया।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">उधर से हाल .. हल् .. की आवाज का उत्तर दिया राकेश ने दिया।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;मैं राकेश बोल रहा हूँ, तुम कौन हो?&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;मैं शगुन की क्लास टीचर .. आज उसका ई-पेपर है। उसने पिछले दो पेपर भी नहीं लिए थे। वह कोई भी काम नहीं कर रही है ..! ऐसा कब तक चलेगा?&#8221; </span><span style="vertical-align: inherit;">मैडम के स्वरूप में खीज़ थी।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;मैडम जी मैं राकेश ..&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">  &#8220;ओह राकेश तुम! शगुन के घर कैसे? क्या वह तुम्हारी बहन है?&#8221; मैडम ने पूछा।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;नहीं मैडम जी हमारे पड़ोस में एक व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है। वहीं बाबा आए हुए हैं। ये कुछ अस्वस्थ हैं। आप मुझे बताएँ क्या काम है?&#8221; </span><span style="vertical-align: inherit;">राकेश ने कहा।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">    मीनाक्षी जानती थी शगुन के माता-पिता यानि रामफल के इकलौते बेटे व पुत्रवधु के असमय काल के ग्रास बनने के बाद शगुन और उसके दो भाई बहनों का बोझ रामफल के बूढ़े कंधों में आ गया था। </span><span style="vertical-align: inherit;">रामफल पास वाले के कस्बे में दर्जी का काम कर जैसे- तैसे घर की गाड़ी खींच रहे थे कि महामारी ने दुकान बंद कर घर बिठा दिया।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;राकेश, बेटा शगुन ने महीने भर से कोई कार्य नहीं किया न ही ई-पेपर दिये।  ऐसा ही चलता रहा तो&#8230;. </span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">जाने अब स्कूल कब खुलते हैं ? क्या तुम शगुन के किसी जानकार का नंबर दे सकते हो जिस पर मैं उसे काम भेजूँ? क्या तुम उसे पढ़ा सकती हो? तुम तो जानते हो इन बच्चों के पिता नहीं हैं।&#8221;</span></span></p>
<p><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">राकेश ने सहर्ष उत्तर दिया, &#8220;जरूर मैडम जी मैं अपने भाई को पढ़ाता ही हूं .. आप मेरे पापा का नंबर लिखिए &#8230; &#8220;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">मीनाक्षी ने नंबर लिखा और उस पर घर का काम भेज दिया।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">    उसी शाम &#8220;पापा कहाँ हैं?&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">              &#8220;घर पर नहीं हैं।&#8221;, बंजारन ने दरवाजे पर पर्दा डालते हुए कहा।&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;&#8221; उनका फोन तो ये रहा .. &#8220;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">बंजारन ने लपक कर फोन उठाया।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;कहा न&#8230;. वो घर पर नहीं हैं बाहर गए हुए हैं। चले आते हैं रोज भिखमंगों की तरह &#8230;&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;क्या हुआ?  काहे शोर मचा रखा है?&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;पापा मुझे फोन  चाहिए।&#8221;, राकेश ने मनुहार पूर्ण स्वर में कहा।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;बित्ते भर का छोरा! इन्हें अभी से फोन चाहिए।  कह दो इसे मेरे घर ना आया करे। जब ​​देखो कुछ ना कुछ मांगने चला आता है।&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;उल्लू के पट्ठे &#8230;. तुझसे बहुत बार कहा है, इधर मत आया कर। भाग यहाँ से कोई फोन वोन नहीं है। ज्यादा पर निकल आए हैं। आवारा कहीं का &#8230;&#8221; पिता के व्यवस्थित घर से लानत मलामत का बोझ उठाए राकेश अपने खंडहर से गिरते हुए पुराने घर में चला आया। </span><span style="vertical-align: inherit;">शाम को बिना कुछ कहे सुने, बिना कुछ खाए पिए मुंह ढक कर सो गया। </span><span style="vertical-align: inherit;">जब अगले रोज भी देर तक नहीं उठा तो माँ ने माथा छूकर पूछा &#8211; &#8220;क्या बात है बेटा सब ठीक है?&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;"> अब राकेश से रहा नहीं गया .. </span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;मां ने मैंने पहले भी कहा था कि मेरा ट्यूशन लगा दो पर आपने वह भी नहीं लगाया।  मुझे फोन की जरूरत है मेरी सारी पढ़ाई आजकल फोन के द्वारा हो रही है। कोई मुझे फोन नहीं दिखाता । मां अगर ऐसे ही चलता रहा तो मैं फिर मजदूर ही बनकर रह जाऊंगा। &#8220;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;अरे पगले मेरे पास कौन से पैसे रखे हैं जो मैं तुझे फोन दिलवा दूँ।&#8221;माँ ने अपनी असमर्थता जाहिर की। </span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;तुम ऐसे करो मेरे स्कूल वाले पैसों में से पैसे निकाल लो। वह मेरे ही पैसे हैं।&#8221;</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;नहीं रे .. थोड़े बहुत पैसे हैं, कभी बुरे वक्त में </span></span>काम आएंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">&#8220;और कौन सा मुश्किल समय आएगा माँ&#8230; जब वह काम आएंगे? अब जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है अभी  काम न आए तो क्या फायदा ऐसे पैसों का! इस वक्त हमें शिक्षा की बहुत जरूरत है, मां! अभी चलो हम बैंक से पैसे लाते हैं। मुझे फोन चाहिए तो बस चाहिए। सुमन के लाख मनाने पर भी राकेश नहीं माना और वो बैंक से पैसे  ले आए &#8230;।</span></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">मीनाक्षी के फोन की घंटी बज रही थी, &#8220;मैडम जी आप मेरा नंबर लिखिए &#8230;. इस नंबर पर आप शगुन का काम भेज दीजिए &#8230;. मैंने अपना फोन ले लिया है। इसी पर मेरे भाई का, शगुन का और उसके भाई बहनों का भी गृहकार्य होगा। मैं उनकी पढ़ाई में पूरी मदद करूंगा। आज से ये सबअपना सारा काम समय पर करके दिखाएंगे इसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूं।&#8221;pritiraghavchauhan.com </span></span></p>
<h5 style="text-align: center;"><span style="vertical-align: inherit;"><span style="vertical-align: inherit;">     </span><span style="vertical-align: inherit;">मीनाक्षी को लगा जैसे राकेश के स्वर में एक पिता का उद्घोष हो।</span></span></h5>
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		<title>राधा भूखी ना हतै&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Sep 2019 09:04:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[pritiraghavchauhan.com नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[नई कहानी प्रीति राघव चौहान]]></category>
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					<description><![CDATA[“आज तो छुट्टी है, चलो आज पूरी सब्जी बनाएँ..”, मुकुंद ने रचना से कहा। “ठीक है गैस भी नहीं है, इंडक्शन पर पूरियाँ आसानी बन जाएँगी”, जी न्यूज  देखते-देखते रचना ने कहा। टी वी पर चिपके चिपके आधे घंटे बीतने के बाद  जब रचना रसोई में पहुंची तो देखा सब्जी मुकुंद बना चुके थे और [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<h5><strong>“आज तो छुट्टी है, चलो आज पूरी सब्जी बनाएँ..”, मुकुंद ने रचना से कहा। </strong><strong style="text-align: center;">“ठीक है गैस भी नहीं है, इंडक्शन पर पूरियाँ आसानी बन जाएँगी”, जी न्यूज  </strong><strong>देखते-देखते रचना ने कहा। टी वी पर चिपके चिपके आधे घंटे बीतने के बाद  </strong><strong>जब रचना रसोई में पहुंची तो देखा सब्जी मुकुंद बना चुके थे और पूरी </strong><strong> का आटा भी तैयार था। रचना की तो बाछें ही खिल गई। हालांकि वो ये </strong><strong>जानती थी कि मुकुंद ने ये आटा गुस्से में गूंधा होगा। प्रायः खाना पकाने  </strong><strong>में हुई देरी उसे नागवार गुजरती थी। परिणामस्वरूप वह चिखचिख से बचने  </strong><strong>के लिए स्वयं ही शुरु हो जाता था।  </strong></h5>
</blockquote>
<blockquote>
<h5><strong>                रचना ने मुस्कुराते हुए मुकुंद से कहा &#8220;चलो हटो… मैं अभी </strong><strong> गर्मागरम पूरियाँ बनाती हूँ।&#8221;, रविवार वो पूरियों की भेंट नहीं  </strong><strong>चढ़ाना चाहती थी। मुकुंद इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि  </strong><strong>क्रोध किसी क्रिया की प्रतिक्रिया मात्र होता है। सामने खड़ी विपरीत </strong><strong> परिस्थितियों की दीवार पर अपने क्रोध की जोर आजमाइश करने से  </strong><strong>बेहतर है तुरंत प्रभाव से वो जगह छोड़ दें…माना जीवन की जीवंत  </strong><strong>परिस्थितियों में कोई ब्लॉक या म्यूट का बटन नहीं होता लेकिन उसे </strong><strong> इसी तरह समझें जैसे उस परिस्थिति को म्यूट कर दिया, ब्लॉक </strong><strong> कर दिया हो और उसने तुरंत वह जगह को छोड़ देना ही उचित समझा।  </strong></h5>
<h5><strong>                      तभी दरवाजे की घंटी बजी और राधा का आगमन हुआ। </strong><strong>राधा आते ही किचन में बर्तनों पर लग गई।  </strong><strong>रचना थाली में पूरियां बेल- बेल कर रख रही थी। घर में केवल  </strong><strong>तीन ही प्राणी थे-वो स्वयं, मुकुंद और उत्कर्ष। रचना गरमा गरम </strong><strong> पूरियाँ बना बना कर दोनों को सर्व कर रही थी। पूरी बनने में समय </strong><strong> ही कितना लगना था। तभी उसका ध्यान गया राधा बर्तन मांज रही है </strong><strong> और आटा कम है। उसे मुकुंद पर गुस्सा आ रहा था सदैव नाप तोल कर  </strong><strong>काम करते हैं। थोड़ा सा आटा और होता तो राधा भी खा लेती। क्या  </strong><strong>कहेगी बेचारी…? अब दुबारा आटा गूंधने के चक्कर में भी नहीं पड़ना </strong><strong>चाहती थी। कुल सात पूरियां बच रही हैं यदि वह राधा को खाने के लिए पहले दे देती है तो उसके लिए एक पूरी कम पड़ सकती हैं। पता भी तो नहीं चलता भूख कितनी है? कहीं उसने दो की जगह चार पूरी मांग ली तो??  </strong></h5>
<h5><strong>उसने अपने आपको इन सारे सवालों से बाहर निकाला और एक थाली में  </strong><strong>बेशर्मी से अपना खाना लगा भीतर चली गई। साथ ही खाने का कटोरदान भी </strong><strong>ले गई।  </strong></h5>
<h5><strong>         इधर राधा मन ही मन सोच रही थी&#8230; कितनी माड़ी नियत की है। </strong><strong>पहले पहल जब मैं आई थी तब कैसे मुझे सबसे पहले पूछती थी और </strong><strong> आज पूरे परिवार ने ढूंस लिया&#8230;. पर क्या मजाल, जो कहा हो&#8230; दो </strong><strong> पूरी तुमहउ खा लेयो.. राधा। क्या हम इनकी पूरिन की मोहताज हैं?  </strong><strong> नू भी श्राद्ध चल रहे हतैं । कहा खबर किस मरे कौ है।अच्छो </strong><strong> भयो जै ना पूछी। पर  यऊ सच हतै ये दो सै छित्तर वाली अब पूरी </strong><strong>तरह बदल गई हतै।  </strong></h5>
<h5><strong>इधर रचना पूरी खा जरूर रही थी परंतु भीतर एक कशमकश थी, राधा क्या सोचेंगी? कितनी मरी नियत की है। चलो अभी भी चार पूरियां बच रही थी। रचना ने एक पूरी कम खाई और अपने एक पूरी कम खाने के त्याग को </strong><strong>महान समझते हुए कटोरदान और झूठे बर्तन लेकर आई। तब तक राधा बर्तन मांज ही रही थी।  </strong><strong>रचना ने राधा के सामने झूठी थाली रखते हुए कहा&#8230;.. “राधा जब बर्तन मांज लो तो यह कुकर खाली कर देना इसमें जो सब्जी रखी है वह और कटोरदान में जो पूरी रखीं हैं वो तुम्हारे लिए है, खा लेना।”, यह कहकर वह दोबारा भीतर चली गई।  </strong></h5>
<h5><strong>दोपहर में जब रचना पानी लेने रसोईघर में पहुंची देखकर हैरान रह गई उत्कर्ष के टिफिन से झूठा खाना खा लेने वाली राधा आज पूरी सब्जी को ज्यों का त्यों छोड़ गयी थी। </strong></h5>
<h5></h5>
</blockquote>
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		<title>Golden Bowl</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Dec 2018 14:52:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[Golden bowl#pritraghavchauhan]]></category>
		<category><![CDATA[https://pritiraghavchauhan.com/]]></category>
		<category><![CDATA[प्रीति राघव चौहान /नई कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[Pritiraghav Chauhan सुनहरी कटोरा  “मम्मी, बुरा ना मानो तो एक चीज मांगू।” शादी के चार साल बाद नेहा ने माँ से कहा। “हां बोल क्या चाहिए?” “तुम मुझे नानी जी वाला कटोरा दे दो!” “ नानी जी वाला कटोरा….”, श्रद्धा ने दिमाग पर जोर देते हुए बोला। “कौन से कटोरे की बात कर रही है?” [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<figure id="attachment_1496" aria-describedby="caption-attachment-1496" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" class="size-full wp-image-1496" src="https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview.png" alt="" width="1280" height="1024" srcset="https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview.png 1280w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview-300x240.png 300w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview-768x614.png 768w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview-1024x819.png 1024w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview-696x557.png 696w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview-1068x854.png 1068w, https://pritiraghavchauhan.com/wp-content/uploads/2018/12/backupPreview-525x420.png 525w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /><figcaption id="caption-attachment-1496" class="wp-caption-text">Golden Bowl</figcaption></figure></blockquote>
<h3>Pritiraghav Chauhan सुनहरी कटोरा</h3>
<h3> “मम्मी, बुरा ना मानो तो एक चीज मांगू।” शादी के चार साल बाद नेहा ने माँ से कहा।</h3>
<h3>“हां बोल क्या चाहिए?”</h3>
<h3>“तुम मुझे नानी जी वाला कटोरा दे दो!”</h3>
<h3>“ नानी जी वाला कटोरा….”, श्रद्धा ने दिमाग पर जोर देते हुए बोला। “कौन से कटोरे की बात कर</h3>
<h3>रही है?”</h3>
<h3>“वही कटोरा…… जो आपको नानीजी ने शादी में दिया था। कांसे का कटोरा….”</h3>
<h3>“क्या कह रही हो तुम? जर्मन सिल्वर और ब्रास मिक्स है उसमें। क्या करेगी उस कटोरे का? आजकल तो कोई ऐसे कटोरे में कुछ खाता भी नहीं!”श्रद्धा ने हैरत से पूंछा।</h3>
<h3>“नहीं मम्मी, एंटीक पीस बनाकर रखूँगी। मुझे बहुत अच्छा लगता है यह कटोरा।”</h3>
<h3>“ठीक है… ले जाना…”उसके बाद नेहा को कितनी खुशी हुई उसके चेहरे के भाव से सहज पता लगा रहा था। नानी के घर का वह कटोरा….  नानी का दिया हुआ वह कटोरा…. नेहा को सदैव ही लुभाता था। जाने कितनी ही बार उस कटोरे में उसने खीर खाई थी सुबह…. शरद पूनम की रात को मां बना कर रखा करती थी और उसी कटोरे में बस दूध पीने की जिद पर अड़ जाती थी। इस कटोरे से कैसी कैसी यादें जुड़ी थी।</h3>
<h3>                 कटोरा था ही इतना शानदार। कांसे- पीतल से बना हाथ भर चौड़ा कटोरा देखते ही बनता था। एकदम झमाझम चमकता था जैसे चांदी का हो और सोने का सुनहरा-पन लिए हुए। माँ का दिया वो कटोरा नेहा को बहुत ही प्रिय था। आजकल के कटोरे जैसे बेपेंदी के नहीं… उस कटोरे के नीचे कड़े जैसी गोल पैंदी लगी हुई थी। जिससे उसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती थी। नीचे से संकरा और ऊपर से उथला। मुड़े हुए किनारों वाला वह कटोरा सचमुच मन मोह लेने वाला था। पहले के जमाने में भी क्या-क्या चीजें हुआ करती थी…. यह कोई पहली बार नहीं था कि नेहा का दिल कटोरे पर आया था। उसे तो अपनी दादी की कठौती भी अच्छी लगती थी.. जो लकड़ी की थी और कठ्ठुआ (लकड़ी से बना रोटी रखने का बर्तन) जिसमें रखी बासी रोटी के आगे पिज्जा भी बेकार लगे।नेहा दादी गले में लटक कर कहती थी… बीबी ये कठौती तो मुझे ही देकर जाना । अब जब उम्र पैंतीस के पार पहुंच रही है अपनी सास से लेकर भी आई तो क्या…. पुरानी पीतल की बड़ी सी टोकनी। पता नहीं क्या ढूंढती है नेहा उन पुरानी चीजों में….</h3>
<h3>                     आज सुबह ही श्रीमती नंदा कह कर गई कि उनके घर सत्यनारायण की कथा है और हवन भी होगा। नेहा जी आपको जरूर आना है। नेहा को सत्य नारायण  की कथा यूँ तो पसंद नहीं है परंतु फिर भी उसने हंसकर हां में सिर हिलाया। श्रीमती नंदा के जाने के बाद मन-ही-मन बड़बड़ाती अंदर आईं… एक कथा को हर महीने कैसे सुन लेते हैं ये लोग.. जब देखो किसी न किसी के घर सत्यनारायण की कथा… क्या जरूरी है बार-बार एक ही कथा?</h3>
<h3>सोमेश ने पूछा “कौन था?”</h3>
<h3>“अरे वही मिसेज नंदा थीं।</h3>
<h3>“क्या कह रही थी” “कुछ नहीं.. कह रही थी सत्यनारायण की कथा है और हवन भी है। आने के लिए कह रही थीं। “चलो बढ़िया है… आज संडे वाले दिन पीछा छूटा…” सोमेश ने चुटकी ली। “क्या क्या कह रहे हो?” “कुछ नहीं, मैं कह रहा था… तुम्हें नई साड़ी दिखाने का मौका मिल जाएगा। इसी बहाने मोहल्ले की सभी औरतों के कपड़े भी देख आओगी और गहने भी। “ओह! सोमेश तुम्हें पता है ना मुझे इन फालतू की चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं है।” “ औरतों को कपड़ों और गहनों में दिलचस्पी ना हो यह तो हो ही नहीं सकता…” “छोड़ो भी, पर लग रहा है जाना तो पड़ेगा ही। आज तो मम्मी भी नहीं है नहीं तो कथा किस्से तो वही निपटा लेती हैं। ठीक है चार बजे जाना है।चार बजे देखते हैं।” नेहा ने कहा। जब नेहा श्रीमती नंदा के घर पहुंची उस समय साढ़े चार बज रहे थे। आधी कथा समाप्त हो चुकी थी। नेहा ने बड़े जतन से अपने पीली साड़ी का पल्लू सिर पर डाला और फिर हाथ जोड़कर ऐसे बैठ गई जैसे कितने बड़ी भक्त हो सत्यनारायण की….. वह भी सबसे अग्रिम पंक्ति में! जैसा कि शहरों में होता है, हवन ड्राइंग कम डाइनिंग रूम में हो रहा था। उस बड़े से हॉल के बीचोबीच दो बाय दो फुट का चबूतरा बना रखा था। जिसके ऊपर हवन कुंड रखा हुआ था और उसके चारों तरफ अलग-अलग कटोरियाँ व कटोरों में हवन सामग्री रखी थी। किसी में किसी में पानी, किसी में चीनी, एक बड़े से थाल में हवन समिधा, एक परात में तरह तरह के फल फूल और हवन कुंड के चारों कोनों पर पानी…… परंतु यह क्या! एक चीज जिसने नेहा का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया वह था नानी का कटोरा….. पीतल और कांसे का कटोरा….. नेहा की आंखों की सुई उसी कटोरे पर अटक कर रह गई। कटोरा चमाचम चमक रहा था। उसके अंदर सुनहरा गाय का घी साक्षात अमृत लग रहा था। अब नेहा के दिमाग के घोड़े दौड़ने की बारी थी। उसके चेहरे पर बार-बार अलग-अलग भाव आज आ रहे थे।</h3>
<h3>यह कटोरा श्रीमती नंदा के घर पहुंचा तो पहुंचा कैसे? पिछले चार साल से वो जिस कटोरे को ढूंढ रही थी वह कटोरा आज यहां इतने लोगों के बीच मिलेगा ये उसने सोचा भी ना था। यह कटोरा श्रीमती नंदा कहीं से लिया होगा….? लेकिन फिर जैसे जैसे उसने दिमाग पर जोर डालना शुरू किया ….. नेहा का मन किसी भी तरह सत्यनारायण की कथा में नहीं लग रहा था। कटोरा श्रीमती नंदा के घर पहुंचा कैसे मन-ही-मन मनन कर रही थी। वो अपने पुराने दिनों में लौट गई, पहले पहल जब इस मोहल्ले में आई थी तो श्रीमती नंदा के घर ही किराए पर रही थी। ओह! तो यह छह महीनों केे प्रवास का प्रताप है कि कटोरा नेहा के घर से उनके घर पहुंच गया। जिस वक्त नेहा का घर बना नेहा खुशी के मारे फूली नहीं समाई और उसने एक बार भी अपने किराए वाले घर को खाली करते समय यह नहीं सोचा कि वहां कुछ छूट भी गया है।पता नहीं कटोरा कैसे श्रीमती नंदा के घर पर ही छूट गया उसे सब याद आ गया था परंतु अब हो क्या सकता था? अब तो कटोरा श्रीमती नंदा का हो चुका था। वह अपने मन को बार-बार समझा रही थी, हो सकता है ये कटोरा श्रीमती नंदा का ही हो और वो थोड़ा और खिसक कर कटोरे के पास जा पहुंची। हवन शुरू हो चुका था। सामग्री हवन कुंड में डालने के बहाने उसने कटोरे को थोड़ा सा छेड़ा। वो दरअसल देखना चाहती थी उस पर उसकी मां का नाम है या नहीं और कटोरे पर माँ का नाम दिखते ही न उसे मंत्र सुनाई दे रहे थे ना उसे पास बैठी महिलाओं के कपड़े दिखाई दे रहे थे न जेवर….. उसका ध्यान था तो बस कटोरे पर। वैसे तो कितना धर्म-कर्म वाली बनती है पर देखो किसी दूसरे के कटोरे को लेकर कैसे सजा कर रखा है। एक बार भी नजर नहीं आया होगा इसको इस पर लिखा हुआ नाम। मम्मी ने कब से संभाल कर रखा हुआ था यह कटोरा। यह तो चोरी हुई ना? सरासर चोरी। क्योंकि जब कटोरे पर नाम भी लिख रहा है तो भी यह नहीं कि उसको वापस लौटा देती। आज के बाद तो इसकी शक्ल भी नहीं देखूंगी। पर जैसे भी हो यह कटोरा तो लेना ही पड़ेगा…. मंत्रोच्चारण की जगह नेहा मन-ही-मन कटोरा-उवाच कर रही थी। आखिरकार कथा खत्म हुई हवन खत्म हुआ। पंडित जी ने सबको आरती दी, प्रसाद के रूप में फल भी। सभी महिलाएं चाय की चुस्कियां लेने लगीं। कोई श्रीमती नंदा की साड़ी की तारीफ़ कर रहा था कोई उनके घर पर हुए नए सुनहरे पेंट की। सभी औरतें धीरे धीरे कर वहां से चलने लगीं। पर नेहा का ध्यान तो अभी भी कटोरे पर ही था वो श्रीमती नंदा के साथ चीजों को समेटने का नाटक करने लगी और उस कटोरे को बड़े प्यार से उठाया। अपने आंखों के पास तक ले कर उस पर लिखा हुआ मां का नाम देखने लगी। भारी मन से उसने कटोरे को श्रीमती नंदा की डाइनिंग टेबल पर रखा रोनी सूरत बनाकर हॉल से बाहर निकली।</h3>
<h3>         घर आते ही…“ सोमी, तुम्हें मालूम है आज श्रीमती नंदा के घर क्या हुआ? तुम्हें पता है वो चांदी जैसा कटोरा जो मम्मी ने दिया था, जिसे मैं इतने दिनों से ढूंढ रही थी……… और बाकी बातें नेहा के मुंह में ही रह गई…..”</h3>
<h3>क्योंकि इस समय उसका ध्यान नेहा की किसी बात पर न होकर है भारत पाक का मैच देखने पर था। नेहा का मन भर आया।</h3>
<h3>          उसने बहन को फोन मिलाया और उसे पूरी की पूरी दास्तान सुनाई लेकिन यह क्या उसकी बहन ने उसे हंसकर टाल दिया और कहां…. जा कर ले आओ। कह दो यह हमारा कटोरा है।</h3>
<h3>“अब ऐसे कैसे मांगे चार साल बाद अपना कटोरा।”</h3>
<h3>…. कैसे दिखता नहीं है उसपर नाम भी लिखा हुआ है।</h3>
<h3> नेहा फिर बिसूरती हुई बोली… “नाम तो मम्मी का लिखा है ना?”</h3>
<h3>“ उन्हें क्या पता तुम्हारी माँ का नाम क्या है? छोड़ो तुमसे बात करना बेकार है।” यह कहकर फोन भी काट दिया।</h3>
<h3>     तभी उसकी छोटी बेटी किट्टू घर पर आई। अभी हाल ही में किट्टू ने सातवीं की परीक्षा दी थी। किट्टू बेटा तुझे पता है आज क्या हुआ…? “क्या हुआ मम्मी?” “जो नंदा आंटी है उनके घर ना हमारा वह सुनहरी पैंदी वाला कटोरा है।”</h3>
<h3>“क्या….? मम्मी वही कटोरा जिसके पीछे आप हमसे रोज जाने कितनी बार क्या क्या कहती रही हो.. आप ही कह रही थीं ना…. इस कटोरे को माला ले गई होगी.. कभी कहतीं थीं इस कटोरे को कमला ले गई होगी और जाने क्या-क्या कितनी बातें सुनाई उस नानी वाले कटोरे के पीछे आपने हमें। अच्छा तो फिर आपने उनसे ले लिया होगा वो…” उत्साहित होकर पूछा किट्टू ने।</h3>
<h3>“तू भी क्या बात कर रही है…”, नेहा दुखी स्वर में बोली – “कैसे लेती ? चार साल पहले खोया था। अब जाकर मैं बोलूं कि कटोरा हमारा है। तो फिर गई ना हमारी साख तो… पड़ोस की बात है उन्हें लगेगा जैसे मैं उन्हें चोर बना रही हूं। अच्छा तो ऐसे कर कि जब उनकी बेटी निकिता के साथ खेलने जाये तो चुपचाप किसी भी तरह उस कटोरे को छिपाकर कर ले आना  ।&#8221;</h3>
<h3>“ ओह मम्मी, ऐसा भी कहीं होता है! ओहो मम्मी ऐसा भी कहीं होता है! यदि उन्होंने मुझे देख लिया तो वह लोग मुझे चोर नहीं समझेंगे? बिल्कुल नहीं। हरगिज़ नहीं मैं यह काम बिल्कुल नहीं करने वाली ।” किट्टू खिन्न स्वरमें बोली।</h3>
<h3>“देख मेरी प्यारी किट्टू…. बस तू ही है जो इनके घर में रोज जाती हैं प्लीज…. किसी भी तरह मेरा कटोरा ले आना ना तू… जो कहेगी मैं तुझे वही बना कर दूंगी।” नेहा उसे मना रही थी। “मम्मी, आप चाहे कुछ भी कहो मैं उनके घर में जाकर अपने कटोरे को बिल्कुल नहीं चुराऊंगी। आप चाहो तो मैं जाकर उनसे वह कटोरा मांग लूंगी।. “बस रहने दे, किसी को मेरी परवाह नहीं।”</h3>
<h3>         नेहा अब उम्मीद का दामन छोड़ चुकी थी कितने दिन उसने उसको खोजा था। कैसे- कैसे भ्रम उसके दिमाग में आए थे? इसने लिया होगा, उसने चुराया होगा और अब जब मिल गया वह भी पड़ोसियों के घर तो चुपचाप मन मसोसकर बैठी थी। हाय रे कटोरा! आज भी जब कभी नेहा श्रीमती नंदा के घर जाती हैं तो उसका पूरा ध्यान केवल इसी बात पर रहता है कि किसी तरह उसे कटोरे की एक झलक मिल जाए। मारे औपचारिकता के कभी भी ड्राइंग रूम से आगे जा ही नहीं पाती। उस घटना के साल भर बाद आखिर वह दिन आ ही गया जब नेहा को उसका कटोरा मिला। दिवाली के बाद छठ पूजा के दिन श्रीमती नंदा ने विशेष किस्म के व्यंजन बनाए थे और उन्हें थाली में सजा कर वह नेहा के लिए लेकर आईं। बीच मैं गन्ने के रस में पकी खीर से भरा वह कटोरा……मानव दांत सा चमक रहा था। कटोरे को देख नेहा घर आए मेहमान का स्वागत करना भी भूल गई! जल्दी थाली लेकर पलट गई। ना राम राम ना श्याम श्याम। न चाय न पानी…. बस थाली ली और पलट गई। श्रीमती नंदा को नेहा का यह व्यवहार उचित नहीं लगा परंतु उन्हें क्या पता था यह सब कटोरे की माया थी। उस रोज़ गन्ने के रस की खीर नेहा को इतनी खुशी दे गई जैसे किसी ने उन्हें अमृत से लबालब भरा कलश दिया हो! उसने भागकर वह कटोरा सोमेश को दिखाया। किट्टू को दिखाया। अपनी बहन को फोन किया, मां को फोन करके बताया…. मारे खुशी के नेहा फूली नहीं समा रही थी। परंतु उसे क्या पता था कि खुशियां तो केवल चार दिन की मेहमान होती हैं चार रोज बाद उन्हें जाना ही होता है…….</h3>
<h3>आंटी जी मेरी मम्मी ने कहा है हमारे बर्तन दे दो निकिता ने चार दिन बाद आकर कहा।</h3>
<h3>“क्या, कौन से बर्तन?”</h3>
<h3>“वही हमारी थाली कटोरा वगैरह…..”</h3>
<h3>अब नेहा की खुशी कपूर हो चुकी थी। उसने थाली और दो कटोरी उठाकर निकिता को पकड़ा दी और कहां… “यही हैं तुम्हारे बर्तन?”</h3>
<h3> निकिता उन्हें ले कर चली गई इस वक्त उसके जाने के बाद नेहा को लग रहा था जैसे उसने जंग जीत ली आखिर अब उसका कटोरा उसके पास में था। पर यह क्या दस मिनट बाद ही दोबारा घंटी बजी। निकिता फिर दरवाजे पर थी नेहा ने दरवाजा खोला और पूछा क्या बात है….?</h3>
<h3>निकिता बोली आंटी जी मेरी मम्मी ने कहा है एक हाथ बड़ा कटोरा जो सुनहरी रंग का है जिस में पैंदी लगी है…. उसके अंदर मम्मी ने आपको गन्ने के रस की खीर दी थी। उन्होंने कहा है वह ले आओ वापस।</h3>
<h2>अब नेहा को काटो तो खून नहीं उसे लग रहा था जैसे सरे बाजार वह अपन ही कटोरे की चोरी के अपराध में पकड़ी गई हो। एक बच्चे से क्या कहती? भारी मन से भीतर गई। चुपचाप रसोई से कटोरा उठाया….. उसमें कुछ गुलाब जामुन रखें और भारी मन से उन्हें उस कटोरे के साथ की प्यारी सी पीतल की तश्तरी से ढककर निकिता को पकड़ा दिया।</h2>
<p>समाप्त</p>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
					
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		<title>वेबसाइट</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Nov 2018 15:49:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[#प्रीतिराघवचौहान]]></category>
		<category><![CDATA[pritiraghavchauhan. com]]></category>
		<category><![CDATA[pritiraghavchauhan.com नई कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[          सुबह-सुबह सुबह एक अच्छे मूड में उठने के बाद सोचा कुछ लिखा जाये ।मन में आज अनेक विचारों के बादल उमड़-घुमड़ कर रहे थे ।पहले मैंने एक लेख लिखना शुरू किया। अभी लेख का पहले गद्यांश ख़त्म किया था अचानक एक कॉल आई&#8230; ट्रिन.ट्रिन&#8230;.. मैंने गफलत में फोन उठाया । [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4>          सुबह-सुबह सुबह एक अच्छे मूड में उठने के बाद सोचा कुछ लिखा जाये ।मन में आज अनेक विचारों के बादल उमड़-घुमड़ कर रहे थे ।पहले मैंने एक लेख लिखना शुरू किया। अभी लेख का पहले गद्यांश ख़त्म किया था अचानक एक कॉल आई&#8230; ट्रिन.ट्रिन&#8230;.. मैंने गफलत में फोन उठाया ।</h4>
<h4>उधर से आवाज आई –“हैलो, हेलो क्या आप सुहासिनी भोंसले बोल रही हैं? “</h4>
<h4>मैंने कहा –“हां मैं सुहासिनी हूं ।“</h4>
<h4>उधर से फिर प्रश्न हुआ, “मैम मैं एक वाई जेड कंपनी से बोल रही हूँ । क्या आप क्या आपने किसी वेबसाइट का डोमेन बुक कराया है?</h4>
<h4>मैंने कहा, “हां करवाया है ।“</h4>
<h4>“कहिए मैम, क्या हम आपके लिए वेबसाइट डिजाइन कर सकते हैं?” वो बोली, हम बताएंगे, “आपको क्या क्या कैसे करना चाहिए।”</h4>
<h4> अब तक मेरी एकाग्रता पूरी तरह भंग हो चुकी थी । मैंने कहा –“आप फिलहाल फोन रखिए मैं अभी व्यस्त हूं ।” कहकर मैंने फोन काट दिया ।</h4>
<h4>जैसे-तैसे मैंने अपने विचारों को फिर इकट्ठा किया और लिखने बैठी कि तभी दोबारा एक कॉल आई,“हैलो क्या आप सुहासिनी भोसले बोल रही हैं?”</h4>
<h4>मैंने अपने आप को संभालते हुए कहा- “हां जी बोल रही हूँ ।“</h4>
<h4>“मैम आपने डोमेन बुक कराया था, क्या आप एक वेबसाइट बनवाना चाहेंगे ।“</h4>
<h4>मैंने कहा, “ नहीं । जब डोमेन मैंने बुक किया है तो वेबसाइट भी मैं खुद ही बना लूंगी ।”</h4>
<h4>उधर से आवाज आई, “मैम, हम प्रोफेशनल आईटी कंपनी से बोल रहे हैं । हम आपके लिए डिजाइन बना देंगे ।”</h4>
<h4> मैंने प्रत्युत्तर दिया, “देखिए फिलवक्त मुझे कोई वेब डिजाइन नहीं चाहिए और मैंने फोन काट दिया ।”</h4>
<h4>तीसरी बार फिर कॉल आया ट्रिन.. ट्रिन ।उठाने पर हैलो… और फिर एक नई लड़की की आवाज अबकी बार मैंने सीधा कहा “देखिये मुझे कोई वेब डिजाइनिंग नहीं करवानी है…… मुझे कोई वेबसाइट नहीं बनवानी। मुझे जो करना होगा मैं स्वयं कर लूंगी।” यह कहकर मैंने फोन काट दिया और इस चक्कर में देखा तो ब्लॉग उड़ चुका था। जाने उंगली किस बटन पर पड़ी कि लेख बिल्कुल गायब!</h4>
<h4>        जैसे तैसे मैंने अपने आप को संयत किया और सोचा क्यों ना एक कविता लिख दी जाए ।अब कविता लिखने बैठी और उधर से फिर कॉल आई। मैंने फोन काट दिया । जब आठवीं बार फोन आया तो मैंने गुस्से में कहा –“हां मैं सुहासनी भोंसले बोल रही हूं और इस दफा यदि तुमने फोन किया तो मैं सौ नंबर पर आपकी शिकायत करूंगी ।“</h4>
<h4> उधर से उस लड़की का स्वर था, “ सॉरी मैम, आपकी आवाज नहीं आ रही ।“</h4>
<h4>  हमने सोचा अब तो कोई फोन नहीं आएगा । इन फोनों के चक्कर में मेरी कविता भी ब्लॉग से रफा दफा हो गई ।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है! आख़िरकार मैंने फोन एक तरफ बंद करके रख दिया और अपना कार्य रोक दिया ।</h4>
<h4> दोपहर में फिर एक फोन आया ।</h4>
<h4>इस बार फिर एक नई मोहतरमा बोलीं, “ हेलो मैम, आप सुहासिनी भोसले बोल रही हैं? रूबी दिस साइड! मैं सुरक्षा वेबसाइट बिल्डर से बोल रही हूं ।हम वेब डिजाइन करते हैं ।क्या आपको एक वेबसाइट बनवानी थी? “</h4>
<h4>     मैंने कहा, “हां जी, बनवानी थी, रूबी जी ।“</h4>
<h4>   अब तक मैं बार-बार के फोन कॉल से तंग आ चुकी थी परंतु अब मैं उनकी तरह उनके सब्र का इम्तिहान लेना चाहती थी ।</h4>
<h4>    मैंने कहा-“ हां जी पर सिग्नल नहीं हैं आपकी आवाज नहीं आ रही है ।“</h4>
<h4>उन्होंने काटकर दोबारा फोन किया&#8230; “हैलो&#8230; सुहासिनी भोंसले.. क्या आपको सुनाई दे रहा है?”</h4>
<h4>  मैंने कहा ठंडी आह भर कहा, “हां जी सुनाई दे रहा है।“</h4>
<h4>      “क्या आपको वेबसाइट बनवानी थी ।“, उधर से फिर प्रश्न किया गया ।“मैम हम आपकी वेब डिजाइन में क्या सहायता कर सकते हैं, आप कैसी वेबसाइट बनवाना चाहेंगी? “</h4>
<h4>    मैंने कहा.. “देखिए रूबी जी, मुझे दो बेडरुम चाहिए.. एक ड्राइंग कम डाइनिंग रूम । हां बाथरूम भी साथ अटैच होने चाहिए और आगे पीछे बॉलकनी हो, ठीक है ना? आगे वाली बालकनी से इंद्रधनुष दिखाई देना जरूरी है! “</h4>
<h4>      उधर से वो हतप्रभ हो बोली, “मैम आप क्या बात कर रहे हैं?” मैंने हँसते हुए कहा, “आप ही कह रही हैं कि आप वेबसाइट बनाती है । तो मैं बता रही हूं मुझे कैसी वेबसाइट बनवानी है ।क्या आप मुझे ऐसी वेबसाइट बना देंगे जिसमें बालकनी से आगे इंद्रधनुष निकलता हुआ रोज नजर आए! मेरी एक शर्त ये भी है कि इस साइट के पास साइटसीन एकदम परफेक्ट हों।</h4>
<h4>अब उधर से खिसियाकर फोन काट दिया गया और मैं अपने बच्चों सहित हंस हंस के लोटपोट हो गई ।</h4>
<h4>मैंने सोचा था अब तो फोन नहीं आएगा । परंतु यह मेरा वहम था छः घंटे बाद शाम सात बजे के करीब फिर दोबारा फोन आया…., “हेलो मैं शैली बोल रही हूं, मैं shiksha.com से बोल रही हूं। हम वैब डिजाइन का काम करते हैं।”</h4>
<h4>“हां जी बोलिए।”</h4>
<h4>“क्या मैं सुहासिनी भौंसले से बात कर रही हूं?”</h4>
<h4>मैंने कहा,“ हां जी आप सुहासिनी भोसले से ही बात कर रही हैं, कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकती हूं?” उधर से फिर एक महीन सी आवाज आई, “मैम हमारी कंपनी वेबसाइट बनाती है, क्या आपको एक वेबसाइट बनवानी थी। “</h4>
<h4>मैंने कहा शैली जी पहले आप मेरी एक बात का जवाब दीजिए… वह बोली ठीक है मैम …..</h4>
<h4>“आप वेज हैं कि नॉन वेज…।”</h4>
<h4>“जी मैं प्योर वेजीटेरियन हूँ।” उसने गर्व से कहा।</h4>
<h4>मैंने कहा, “पहले बताइए आपको कौन से सब्जी पसंद है?”</h4>
<h4> उधर से हंसी के साथ आवाज आई, “आलू।”</h4>
<h4>मैंने कहा और बताइये… सब्जी नहीं सब्जियां बताइये। “ओह.. मतलब आलू, बैंगन, गोभी।”</h4>
<h4>मैंने थोड़ा सा चकित होते हुए पूछा… “बैंगन, गोभी?</h4>
<h4>हद कर दी आपने…. बैंगन और गोभी भी कोई खाने की चीज होती है?”</h4>
<h4>“नहीं मैम मुझे पसंद है ।”</h4>
<h4>“क्या आपको नहीं पता बैंगन और गोभी में कीड़े होते हैं? ”, मैंने बात बढ़ायी।</h4>
<h4>अब वह फिर हंसी.. बोली, “कीड़े तो हम निकाल देते हैं।”</h4>
<h4>मैंने कहा _“ऐसे कैसे निकाल सकते हो? माना आपने निकाल दिए कीड़े… लेकिन कभी सोचा है कि जब आप रेस्टोरेंट में जाकर खाना खाते हैं या बाहर जाकर खाना खाते हैं तो इस बात की क्या गारंटी है कि वह बैंगन और गोभी कीड़े वाली नहीं बना देते?”</h4>
<h4>उसने कहा, “मैडम ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं।”</h4>
<h4> “ठीक है, चलो ठीक है… मान लिया कि आप वेजिटेरियन और नॉन वेजिटेरियन दोनों हैं।” मैं बोली। “नहीं मैडम, मैं नॉन वेज नहीं खाती!”</h4>
<h4>“मैंने फिर जवाब दिया… ऐसे कैसे नहीं खाती हैं नॉन वेज…. गोभी भी आप खाती हैं और बैंगन में भी! या तो आप मानिए कि आप नॉनवेज हैं तभी हम आगे बात करेंगे।”</h4>
<h4>“ ठीक है, मैंने मान लिया…”</h4>
<h4>“क्या आपको पता है सब्जियों के लिए कहां</h4>
<h4>मिलता है?”</h4>
<h4>वह बोली – “क्या कहा? अब इसमें थैला कहां से आ गया?”</h4>
<h4>मैंने कहा – “मैडम मुझे सब्जी लेने जाना था।मैं थैला ढूंढ रही थी और आप हैं की वेबसाइट वेबसाइट कर रहीं हैं।”</h4>
<h4>“ओह सॉरी।”</h4>
<h4>मैंने कहा – “यह बताइए आपको मेरा नंबर कहां से मिला?”</h4>
<h4>वह बोली – “इंटरनेट से।”</h4>
<h4>मैंने कहा – “अब यह बताइए क्या इंटरनेट पर केवल मेरा ही नंबर है दिमाग खाने के लिए? सुबह से कितने कॉल आ चुके हैं। अभी तक आप लोग मेरा बैंड बजा रहे थे और अब मैं आपका… तो बताइए क्या अभी भी आप वेबसाइट बनाना चाहेंगी?”</h4>
<h4>उसने हंस कर कहा- “आपसे बात करके अच्छा लगा, सॉरी..”</h4>
<h4></h4>
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		<title>गिनती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Aug 2018 05:50:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[Counting]]></category>
		<category><![CDATA[Nai kavita/pritiraghavchauhan.com]]></category>
		<category><![CDATA[pritiraghavchauhan.com /new kavita]]></category>
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					<description><![CDATA[वो आये/औंधे किये गये लगाये गये ठप्पे/जतन से सफेद अनपढ़ कामगारों ने गिन डाले सारे गिनती सीखना उतना बड़ा काम नहीं था जितना गिनती को बनाए रखना पहले वो थालियाँ गिनती थीं अब गिलास भी पचास बच्चों के लिए पचास थाली पचास गिलास /एक पतीला एक छलनी और पांच सौ के लिये दस गुना उनके [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<h2><strong>वो आये/औंधे किये गये</strong></h2>
<h2><strong>लगाये गये ठप्पे/जतन से सफेद</strong></h2>
<h2><strong>अनपढ़ कामगारों ने गिन डाले सारे </strong></h2>
<h2><strong>गिनती सीखना </strong></h2>
<h2><strong>उतना बड़ा काम नहीं था</strong></h2>
<h2><strong>जितना गिनती को बनाए रखना </strong></h2>
<h2><strong>पहले वो थालियाँ गिनती थीं </strong></h2>
<h2><strong>अब गिलास भी</strong></h2>
<h2><strong>पचास बच्चों के लिए पचास थाली </strong></h2>
<h2><strong>पचास गिलास /एक पतीला </strong></h2>
<h2><strong>एक छलनी</strong></h2>
<h2><strong>और पांच सौ के लिये दस गुना </strong></h2>
<h2><strong>उनके अपने दुख हैं/अपने भय </strong></h2>
<h2><strong>एक गिलास का खोना </strong></h2>
<h2><strong>उन्हें चोर बना देता है </strong></h2>
<h2><strong>नन्हें बच्चे काणी चिड़िया जैसे होते हैं </strong></h2>
<h2><strong>जो अपनी आँख में </strong></h2>
<h2><strong>चुपचाप दबा लेते हैं चमकीले दाने</strong></h2>
<h2><strong>इस विशाल प्रांगण में.. </strong></h2>
<h2><strong>गिनती सीखना उतना बड़ा काम नहीं </strong></h2>
<h2 style="text-align: left;"><strong>जितना गिनती को बनाए रखना</strong></h2>
</blockquote>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>छुट्टियाँ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pritiraghavchauhan.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 Jun 2018 13:48:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[#pritraghavchauhan holidays]]></category>
		<category><![CDATA[https://pritiraghavchauhan.com/]]></category>
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					<description><![CDATA[छुट्टियाँ छुट्टियाँ शुरु होते ही मन बल्लियों उछलने लगता हैं। ढेरों योजनाएं बनाई जाती हैं। हर बार की तरह छुट्टियों में भी बहुत सारे काम थे जो निपटाने थे। कुछ रिश्तेदारों से मिलना, गरीब बच्चों को पढ़ाना, अपने लेखन के लिए अच्छा समय निकालना और अपने लिए व्यायाम जैसे छोटे-मोटे बहुत से काम… ………….. अभी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1>छुट्टियाँ</h1>
<h3>छुट्टियाँ शुरु होते ही मन बल्लियों उछलने लगता हैं। ढेरों योजनाएं बनाई जाती हैं। हर बार की तरह छुट्टियों में भी बहुत सारे काम थे जो निपटाने थे। कुछ रिश्तेदारों से मिलना, गरीब बच्चों को पढ़ाना, अपने लेखन के लिए अच्छा समय निकालना और अपने लिए व्यायाम जैसे छोटे-मोटे बहुत से काम…</h3>
<h3>…………..</h3>
<h3>अभी गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हुए सात दिन भी नहीं हुए थे कि छुटंकी ने रट लगा ली &#8230;</h3>
<h3> “ चलो ना पापा कहीं बाहर घूमने चलते हैं। सभी लोग बाहर जाते हैं……. तो हम क्यों नहीं जा सकते? ज्यादा दूर नहीं तो थोड़ा पास ही चल पड़ेंगे। चलो ना… चलते हैं। हमने तो आज तक गुड़गांव का ‘ किंगडम ऑफ ड्रीम्स ‘, भी नहीं देखा….. मेरे सभी दोस्त बाहर घूमने के लिए गये हैं।“ प्रज्ञा ने मचलते हुए कहा ।</h3>
<h3>“ओ हो ! कह तो दिया चलेंगे।” कुणाल ने हां में हां मिलाई।</h3>
<h3>परंतु वो बात मुझसे कर रही थी। इधर मैंने उधर कुणाल दोनों ने ऑनलाइन के ओ डी की टिकट के प्राइस देखने को मिला शुरु कर दिये। यह क्या…?तीन हजार रुपये एक आदमी के… यानी हम चार…. तो एक दिन के लिए बारह हजार ! कुणाल ने हँसकर प्रज्ञा को झूठी तसल्ली दी……..</h3>
<h3>“ ठीक है चलेंगे। “</h3>
<h3>पूर्णिमा को बारह हजार कुछ ज्यादा लग रहे थे।</h3>
<h3>“यह क्या? अलग-अलग स्टेट के खान-पान को देखने के लिए और थिएटर जो हम फ्री में देखते हैं…. उसके लिए बारह हजार… यह कुछ अच्छा सौदा नहीं है।”, उसने छुटकी को समझाया….. “इतने पैसे में तो हम हिल स्टेशन घूम आएंगे। कोई आसपास के हिल स्टेशन को गूगल में सर्च करके बता तो जरा ।”</h3>
<h3> वो उसका ध्यान डाइवर्ट करने में सफल रही। प्रज्ञा ने बेस्ट हिल एरिया नीयर गुड़गांव… देखने शुरू किये। मुझे देख कर उत्साहित होते हुए बोली, “मम्मी! यह देखो कितनी सुंदर जगह है। लैंसडाउन टॉप टेन की सूची में है।”</h3>
<h3>“चलो देखो जरा कितनी दूर पड़ती है।” उसने हंसते हुए कहा ।</h3>
<h3>“मम्मी, बस 6 घंटे का रास्ता है टैक्सी से। चलो चलते हैं।</h3>
<h3>“बहुत अच्छा.. ठीक है। जरा होटल का किराया देखो कितना पड़ेगा,,, सस्ता कौन सा है। देखो फाईव स्टार फोर स्टार तो शायद हमारे बजट में नहीं होगा। ठीक ठाक देख लो।” पूर्णिमा ने कहा।</h3>
<h3>“होटल का किराया तो दो जन का साढ़े पांच हजार का बैठ रहा है। यानी कि हम दो लेंगे तो ग्यारह हजार पर नाइट हैं।” प्रज्ञा ने बताया।</h3>
<h3>उसने झल्लाते हुए कहा “ग्यारह हजार एक रात के लिए। किसी और जगह पर देख लो।”</h3>
<h3>“हमें कितने दिन के लिए वहाँ रहना है? चार दिन या पाँच दिन।”</h3>
<h3>“चार दिन काफी रहेंगे।”</h3>
<h3>“ठीक है ,, मम्मी यह कसौली देखो कितना खूबसूरत है देखो। पर यहां भी होटल के रेट ऐसे ही हैं………. होटल सामंथा _सात हजार । लगभग इसी रेंज के हैं।”</h3>
<h3>“नहीं भाई नहीं! एक कमरे के लिए सात यानि कि दो कमरों के लिए चौदह हजार और चौदह चौक छप्पन हजार रुपए। भला बताओ तो, ये केवल ठहरने के हैं। वहां पर खाना भी खाना है, घूमना भी है और आने जाने का किराया भी है। यह हमारे बस का नहीं है। कोई सस्ता सा देखो।” अब पूर्णिमा को लग रहा था कहाँ रोजे छुड़ाने चले थे नमाज़ गले पड़ रही है और।</h3>
<h3>“चलो ठीक है ममा, ये एक प्यारा सा हिल स्टेशन है औली। है भी दो घंटे की दूरी पर।”</h3>
<h3>“क्या बोली…. कितनी दूर है…?”</h3>
<h3>“बस यही कोई दो घंटे का रास्ता है। केवल एक हजार में होटल….”</h3>
<h3>“हूँ, जरा दिखा तो ऐसी कौन सी जगह है?”, जब उसने देखा औली जोशीमठ के पास है और वह 380 किलोमीटर दूर है तो उसकी साँस में साँस आई। ये औली जो प्रज्ञा ने देखा एक कस्बा था जो सोहना के पास था।</h3>
<h3>“वाह बेटा ढंग से देख तो लिया कर… अगर तुझे स्माल बजट में कोई चीज दिखे तो देखना। लगभग बीस हजार में हम कहीं घूम आएंगे।”</h3>
<h3>“मम्मा यह देखो, यह डलहौजी है।”</h3>
<h3>“कितनी दूर है….. ओहो तुम्हें पता भी है &#8211; तुम्हारे पापा ज्यादा देर बैठ कर गाड़ी नहीं चला सकते। उनकी कमर में दर्द होने लगता है और टैक्सी हम अफोर्ड नहीं कर सकते।” उसने प्रज्ञा को बरगलाते हुये कहा।</h3>
<h3>“इस से तो बेहतर है कहीं बाय एयर चलें।”</h3>
<h3>“ठीक है मम्मा गोवा चलें।” प्रज्ञा ने खुश होते हुए कहा।</h3>
<h3>“गर्मी में….. एक भजन निकाल दो गूगल में।” पूर्णिमा ने अनसुना करते हुए कहा।</h3>
<h3>“लग तो बड़ा हरा भरा रहा है..”</h3>
<h3>“अच्छा बाय एयर किराया निकाल जरा कितना है?”</h3>
<h3>“ममा यह देखो पहले, होटल देखो, यहां पर होटल सस्ते हैं।”</h3>
<h3>“ठीक है पर जाने का किराया तो देख कितना पड़ेगा?” और उसने फिर सर्च मारना शुरू किया….. “यह क्या सैंतीस हजार एक तरफ का!</h3>
<h3>“ओहो इकॉनामी क्लास&#8230;..देख लेना।</h3>
<h3> “ अच्छा मेरे फोन में तो उन्नीस हजार आ रहा है ।”</h3>
<h3>“मेक माय ट्रिप देखो&#8230;. तिरुपति बालाजी टूर सबसे अच्छा है ।” मैंने मुस्कुराते हुये दखल दिया ।</h3>
<h3>“यानि हम बालाजी, पांडिचेरी घूमने के लिए जायेंगे ।जरा देखो तो सही कौन सी डेट देख रही हो मम्मा सितंबर………? सितंबर में तो हमारे पेपर होंगे। ऐसे करो आप ही हो आना। आपको कहीं जाना तो है नहीं ।आप न मुझे गोल गोल घुमा रही हो।”</h3>
<h3>इस बीच कुणाल सब्जी लेकर आ गए थे। सब्जी मंडी से सब्जियां सस्ती पड़ती हैं। अरे तुम लोग अभी तक यहीं बैठे हो।</h3>
<h3>“पापा देखो.. हमने ना.. टिकट देखी हैं। चलो गोवा चलेंगे। आप को ज्यादा देर गाड़ी में बैठना भी नहीं पड़ेगा और हम बाय एयर गोवा पहुंच जाएंगें”</h3>
<h3>“छोड़ छुटकी क्या घूमने की रट लगा रखी है। “अभी इतने पैसे नहीं हैं मैं यह कहना ही चाह रही थी कि कुणाल झुंझला कर बोले – “जहां जाना हो तुम दोनों हो आओ। मैं बीस हजार रुपये दे दूंगा। एक बार कह दिया ना सर्दियों की छुट्टियों में चलेंगे। चाहे बेशक लंबा ट्रिप लगा लेंगे। अंडमान निकोबार वगैरा का।”</h3>
<h3>“आप हमेशा ऐसे ही करते हो। सभी बच्चे कहीं ना कहीं घूमने गए हुए हैं। कोई वैष्णो देवी कोई गोवा कोई थाईलैंड…. एक हम हैं कि कहीं नहीं जाते।” प्रज्ञा ने रुंआसे स्वर में कहा।</h3>
<h3>“नहीं बेटा चलेंगे हम चलेंगे किंगडम ऑफ ड्रीम्स।”</h3>
<h3>“क्या कह रहे हो कुणाल? तुम्हें पता भी है वहां चार जनों का एक दिन का खर्चा बारह हजार रुपए है! पैसे पेड़ पर लगते हैं क्या?”</h3>
<h3>“बेटा छोड़ के केओडी बहुत महंगा है।“</h3>
<h3>“ क्यों न हम पिक्चर देखने चलें।” एक बार फिर प्रज्ञा चहकी।</h3>
<h3>“पिक्चर आज जाएंगे तो डबल पे करना पड़ेगा। पर कुल मिलाकर तुम्हें तो खर्चा करना। जब तुम कमाओगे तो पता चलेगा कैसे जाते हैं, किंगडम ऑफ ड्रीम्स।”</h3>
<h3>“दिल छोटा मत कर बेटा, हम अपने सुल्तानपुर बर्ड सेंचुरी में चलेंगे। खाना घर से ले जाएंगे।बीस रुपए के टिकट और डेढ़ सौ रुपए घर के खाने के लिए जो लेते हैं । यानी कुल मिलाकर हम चार पांच सौ में मजे से सुल्तानपुर घूम आएंगे। सुबह चलेंगे शाम तक वापस। सस्ते बजट में हम घूम भी आएंगे और पिकनिक भी हो जाएगी क्या ख्याल है?” कुणाल ने कहा कि सुझाव दिया।</h3>
<h3>“आपका दिमाग खराब है क्या?” गर्मी में कोई सुल्तानपुर जाता है?” प्रज्ञा भुनभुनाई।</h3>
<h3>“तो ठीक है फिर ऐसे करते हैं… इस महीने हम हम जम कर एसी चलाते हैं और पांच हजार में घर बैठे शिमला के मजे लेते हैं।” पूर्णिमा ने अपनी मध्यमवर्गीय गरीबी पर हँसी का जामा ओढ़ते हुए कहा। ”</h3>
<h3>“हद हो गई मम्मी… आपका जम के एसी चलाना भी ऐसा ही होगा! एक कमरे में पड़े रहो, उसका भी दरवाजा बंद!!! इससे तो बेहतर मेरी कभी छुट्टियां ना हों।” प्रज्ञा ने तंज कसा।</h3>
<h3>कुणाल ने टीवी पर तूफान के कारण दी जा रही चेतावनी का स्वर ऊँचा कर दिया।</h3>
<h3></h3>
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		<title>मैंक्यों रुकूँ???</title>
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		<pubDate>Sat, 10 Mar 2018 09:26:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नई कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[Priti Raghav Chauhan]]></category>
		<category><![CDATA[pritiraghavchauhan.com/anantyatra]]></category>
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					<description><![CDATA[मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ..  दूसरे की ताल पर गीत कोई  क्यों लिखूँ              माना बड़ी उड़ान है              उलझा आसमान है              उस छोर पर हैं रश्मियाँ               उससे पहले क्यों रुकूँ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3><strong>मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ.. </strong></h3>
<h3><strong>दूसरे की ताल पर गीत कोई </strong></h3>
<h3><strong>क्यों लिखूँ</strong></h3>
<h3><strong>             माना बड़ी उड़ान है</strong></h3>
<h3><strong>             उलझा आसमान है</strong></h3>
<h3><strong>             उस छोर पर हैं रश्मियाँ</strong></h3>
<h3><strong>              उससे पहले क्यों रुकूँ</strong></h3>
<h3><strong>मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ.. </strong></h3>
<h3><strong>             विनीत मैं ही क्यों रहूँ</strong></h3>
<h3><strong>              नमित मैं ही क्यों रहूँ</strong></h3>
<h3><strong>             नंगी आदमबस्तियों में </strong></h3>
<h3><strong>               चेहरा अपना क्यों ढकूँ</strong></h3>
<h3><strong>   मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ.. </strong></h3>
<h3><strong>            ये लाल लाल बिंदिया</strong></h3>
<h3><strong>            ये सुर्खियाँ लगाऊँ क्यों</strong></h3>
<h3><strong>             भाल ऊँचा है मेरा </strong></h3>
<h3><strong>             लटों से छिपाऊँ क्यूं </strong></h3>
<h3><strong> मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ.. </strong></h3>
<h3><strong>              मुझे मेरी उड़ान दो</strong></h3>
<h3><strong>              पूरा आसमान दो</strong></h3>
<h3><strong>              बेशक बन कल्पना</strong></h3>
<h3><strong>              मध्यमंडल में जलूँ</strong></h3>
<h3><strong>मैं क्यों रुकूँ, मैं क्यों झुकूँ.. </strong></h3>
<h3><strong>              प्रीति राघव चौहान </strong></h3>
<h3><strong>       </strong></h3>
<h3><strong>               </strong></h3>
<h3><strong>           </strong></h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
					
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