सीढ़ी

“मुट्ठी में रखना, छूट दी… तो सर पर चढ़ कर नाचेगी!”, अहिल्या ने हाथ नचाते नचाते हुए श्रीधर से कहा।

“चिंता मत कर अम्मा, मैं चेतना को जरा भी ढील न दूंगा।”, शादी के छः महीने बाद चेतना को श्रीधर अपने साथ दिल्ली लेकर जा रहा था। वहाँ उसकी पोस्टिंग थी। वहां काम करने वाला कोई नहीं, कैंटीन का खाना बेकार है आदि तरह तरह की बातें सुनकर माँ ने चेतना को लल्ला के साथ भेजना मंजूर कर लिया। पी. डब्ल्यू. डी. में कार्यकारी अभियंता श्रीधर की पत्नी चेतना भी बैंगलुरु के अच्छे संस्थान से सिविल इंजीनियरिंग पास थी। परन्तु कानपुर के कल्याणपुर जैसे छोटे से कस्बे में आने के बाद उसका मुंह हाथ भर लम्बे घूंघट से बाहर नहीं निकला।

     चेतना ने झुककर सबके पैर छूकर आशीर्वाद लिया और घूंघट में मुस्कुराती हुई क्रेटा गाड़ी में पीछे गठरी सी जा बैठी। कल्याणपुर से बीस किलोमीटर बाहर निकल श्रीधर ने मुस्कुराते हुए

कहा _“आगे आ जाओ चेतना, अब हम रूढ़ियों की सीमा से बाहर हैं। चेतना… चेतना… बुरा मान गईं क्या? कब तक यूँ घूंघट में परेशान होती रहोगी?”

    “ओ हो, श्री! बस एक मिनट.. समाज शास्त्र के सिद्धांत का एक पेज बाकी है।”, चेतना ने लम्बे घूंघट में से अपना टैब निकाल कर दिखाते हुए कहा।

डेढ़ वर्ष बार चेतना सिविल सेवा में चयनित हो चुकी थी।

 श्रीधर का हाथ उसके लिये मुट्ठी नहीं सीढ़ी था।

VIAPriti Raghav Chauhan
SOURCEप्रीति राघव चौहान
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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