सियासी झगड़ों से बचपन को बचाना था

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बचपनसियासी झगड़ों से बचपन को बचाना था

दुनियावी बातों में हम दीवानावार हुए 

न रहे अपनो के न गैरे तलबगार हुए 

साथी सभी एक एक कर खुदा हो गए 

 देख हम उन्हें गुलशन ए गुलज़ार हुए 

ज़िन्दगी को बन कर कैदी गुजारना

फितरत नहीं थी यूँ हर पल रफ़्तार हुए 

रूढ़ियों से ऊबकर चाह बैठे जागरण

रोज अखबार का नया इश्तिहार हुए 

मेरी ख़ला में वो संझा सी मुस्काती रही

हम उसकी हँसी के नगमा निगार हुए 

ज़िन्दगी रोज़ नया इम्तिहान लाती रही

आलिमे नज़र में नाहक नागवार हुए 

सियासी झगड़ों से बचपन को बचाना था 

मिट्टी लिए हाथों में संग उनके कुम्हार हुए 

“प्रीति राघव चौहान “

गुरुग्राम 

 

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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. एक रचनाकार सदैव अपनी कृतियों के रूप में जीवित रहता है। वह सदैव नित नूतन की खोज में रहता है। तमाम अवरोधों और संघर्षों के बावजूद ये बंजारा पूर्णतः मोक्ष की चाह में निरन्तर प्रयास रत रहता है। ऐसी ही एक रचनाकार प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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