जिस रोज हम सक्षम होंगे

परचम तभी फहराएंगे

हिंद ए आजादी के

तराने तभी गाएंगे

नींद में थे तभी शायद यूँ पीछे रहे

अब शुरु हुए हैं न उनके हाथ आएंगे

जिस रोज हम सक्षम होंगे

परचम तभी फहराएंगे

जहालत में आज तक

रक्खा इक परिवार ने

सक्षम की ले मशाल

उन्हें आईना दिखाएंगे

जिस रोज हम सक्षम होंगे

परचम तभी फहराएंगे

सिंहासन चाहे भारी हो

शिक्षित के आगे च्यूंटी है

घर घर अलख जगाकर

डंका ए कलम बजाऐंगे

जिस रोज हम सक्षम होंगे

परचम तभी फहराएंगे

भ्रष्टाचारी रिश्वतखोरी

है मूल सभी का अशिक्षा

अशिक्षा है अभिशाप इसे

समूल नष्ट करवाएंगे

जिस रोज हम सक्षम होंगे

परचम तभी फहराएंगे

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