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 उपभोक्तावादी संस्कृति/सभ्यता

हर चेहरा एक विज्ञापन

एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़

एक दूसरे को नीचा दिखाने की चाह

हर एक उत्पाद आता नजर

दूसरे की टांग खींचता

प्रतिस्पर्धा नहीं ईर्ष्या  बन गई  है नीयति

इस संस्कृति और सभ्यता की

विज्ञापनों के इस दौर में

खोखली हंसी /नकली आंसुओं की संस्कृति में

मैं बिना बहे  रह पाऊंगी

क्या मेरी अभिव्यक्ति भी

बन जाएगी विज्ञप्ति

प्रीति राघव चौहान

VIAPritiraghavchauhan
SOURCEPritiraghavchauhan
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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