लाल दीवारें..

सतरंगी होने की आस में लाल दीवारें

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लाल दीवारें /भीगी नहीं हैरान थी 

दीवारों से निकल 

 देखने आईं कुछ आँखें 

हो विकल बारम्बार     

कदम रह गये ठिठक कर उस द्वार 

जिसके पीछे बहुत सी

पलकें थीं प्रतीक्षारत 

क्या  दुनिया यूँ भी ख़त्म होती है.. 

अनंत यात्रा में

ये तो बस पड़ाव था  

यात्रा जारी है 

वो बीज जो रोप दिये 

लाल दीवारों के भीतर 

छा जायेंगे चहुँ ओर

बन सुवासित इंद्रधनुष 

दीवारें स्वमेव

हो जायेंगी सतरंगी 

़                                           

VIAप्रीति राघव चौहान
SOURCEप्रीति राघव चौहान
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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