मन ये चाहे तू बच्चा हो जा

बचपन की आँख में सपने हैं बहुत बड़ों की आँख में बस ख़ुद का जहाँ रहता है

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मन ये चाहे तू बच्चा  हो जा

 खफ़ा सच से मगर सारा जहाँ रहता  है

मुँह पर तेरा पीठ फिरते ही फिरा

जहाँ ये दोगला  सच को कहाँ सहता है

आईना हो तो तोड़ सकते हो

अपने चेहरे से जुदा दर्द कहाँ रहता है

बचपन  की आँख में सपने हैं बहुत

बड़ों की आँख में बस ख़ुद का जहाँ रहता है

क्या जरूरी है हर शय में मुनाफा़ देखें

बचपन ही है जो अय्यारी से जुदा रहता  है

ये माना बदली  है सूरत और शक्ल

मुझमें  आज भी वो बच्चों सा  गुमां रहता है

VIAप्रीति राघव चौहान
SOURCEप्रीति
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. एक रचनाकार सदैव अपनी कृतियों के रूप में जीवित रहता है। वह सदैव नित नूतन की खोज में रहता है। तमाम अवरोधों और संघर्षों के बावजूद ये बंजारा पूर्णतः मोक्ष की चाह में निरन्तर प्रयास रत रहता है। ऐसी ही एक रचनाकार प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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