मनु पुत्र

हे मनु पुत्र तुम सृष्टि रचियता बनों इसमें

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हे मनु पुत्र तुम सृष्टि रचयिता

बनो इसमें संदेह नहीं

धरा पुत्र कहलाओगे

यह इस धारिणि के मूक वचन

मंगल विजय करो

या बुलैट गति से घूमों  तुम

बम बनाओ दुनिया भर के

या सागरमाथा छू लो तुम

सकल सृष्टि से होकर बेकल

तुम ढूंढोगे भू का  स्पंदन

धरापुत्र  कहलाओगे  ये

इस धरिणी के मूक वचन

गति में लय है माना

रोमांचकारी ऊंचाई है

विस्मयकारी लहरों की ताल

तुम्हें तनिक लुभा ना पाई है

नंगे पैरों भू पर चलकर

करोगे भू का ही वंदन

धरा पुत्र कहलाओगे

इस धारिणि  के मूक वचन

माना  मेरे सुत तुम मुझसे

ना किसी कोण से मिलते हो

पुरुषार्थ तुम्हें प्रिय है

धैर्य मही सा रखते हो

मानो ना मानो मनु पुत्र

तुम होगे मुझ में ही भग्न

और धरापुत्र कहलाओगे

यह इस धारिणी के मूक वचन

VIAPritiraghavchauhan
SOURCEPritiraghavchauhan
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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