पिता

पिता एक छत

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पिता
आरुषि

पिता एक छत की तरह होता है जैसे सुनते आए हैं देखा भी है। पिता के पास अपार संभावनाओं का थैला होता है जो तमाम उम्र के बच्चों पर लुटाने के बाद भी खत्म नहीं होता। पर राकेश के सर से ये छत होते हुए भी नारद था। उसके पिता का थैला बंजारन चुड़ैल की मुट्ठी में कैद था। जिस उम्र में बच्चे अपने पिता के जूतों में पैर फंसाकर खिलखिलाते हैं वो उम्र नन्हे राकेश ने माँ के साथ कोर्ट, थाने, कचहरियों के चक्कर लगाते हुए दी। चालीस किलो की अशिक्षित माँ … तिसपर छोटा भाई अलग …

           बाप को बंजारन चुड़ैल जो हरफनमौला थी उसकी कंपनी में मिली और लोकलाज से दूर उसके अपने ही घर में आ डटी। गाँव वालों के कहने सुनने पर डायन उसके पिता को ले सात घर दूर जा बसी । पिता के थैले के सभी मोती उस चूड़ैल की भेंट चढ़ते रहे और राकेश अपने ही गाँव में बेचारगी की पौध सा बढता गया। पढ़ाई में सबसे आगे …. उसके स्कूल में उसकी टक्कर का दूसरा कोई न था।

     जबसे अॉनलाइन शिक्षा का चलन आया राकेश को मोबाइल फोन की आवश्यकता आन पड़ी। अबकी बार वह नौवीं कक्षा में आ गया था। विद्यालय से सारा कार्य जो मोबाइल पर हो रहा था।पढ़ाई से दूरी उसकी विकलता को बढ़ा रही थी।

              पांच बाई पांच की कोठरी में चल रही चूड़ी बिन्दी की दुकान भी मुनाफा नहीं दे रही थी। महीने भर में एक के बाद एक हुई दो तीन जवान मर्दों की मौत ने मौहल्ले भर की औरतों को बेवा का सा पैरहन जो पहना दिया था। गाँव और शहर की मौतों में यही तो फर्क होता है, जहाँ शहरों में महीन मेकअप में लिपी पुती मूक संवेदना व्यक्त करते हुए एक बार में ही अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लौट जाती हैं मौहल्ले वालियाँ वहीं गाँव वालियाँ मैले -कुचैले घूंघट में दहाड़ मार कर रोती हैं। हैं। जिसका गया वो तो बेवा होता ही है; आस पास की हमजोलिनों से ले दादी, नानी, चाची, बहनें, बूआ सबकी सब सूजी आंख और पकौड़े सी नाक के लिए बेश्रंगार महीने भर बैठी रहती हैं।

        राकेश अपने पड़ोस के ऐसे ही एक बुरे वक्त में भाग भाग कर चाय पानी पकड़ाने का कार्य कर ही रहा था कि बाबा रामफल का टिकटिकिया फोन बज उठा। राकेश ने दौड़कर बाहर सड़क पर बिछी दरी पर बाबा को फोन पकड़ाया। रामफल ने फोन पर हौले से ‘हेल’ बोला। उसकी सारी शक्ति तो उसके बेटे सुमेर संग चार तीन साल पहले ही चली गई थी।

“हाँ जी, मैडम जी .. मैं शगुन का बाबा ..”। कहते हैं भर्रा गया रामफल की आवाज। राकेश ने मौके की नजाकत को समझ बाबा से फोन ले लिया।

उधर से हाल .. हल् .. की आवाज का उत्तर दिया राकेश ने दिया।

“मैं राकेश बोल रहा हूँ, तुम कौन हो?”

“मैं शगुन की क्लास टीचर .. आज उसका ई-पेपर है। उसने पिछले दो पेपर भी नहीं लिए थे। वह कोई भी काम नहीं कर रही है ..! ऐसा कब तक चलेगा?” मैडम के स्वरूप में खीज़ थी।

“मैडम जी मैं राकेश ..”

  “ओह राकेश तुम! शगुन के घर कैसे? क्या वह तुम्हारी बहन है?” मैडम ने पूछा।

“नहीं मैडम जी हमारे पड़ोस में एक व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है। वहीं बाबा आए हुए हैं। ये कुछ अस्वस्थ हैं। आप मुझे बताएँ क्या काम है?” राकेश ने कहा।

    मीनाक्षी जानती थी शगुन के माता-पिता यानि रामफल के इकलौते बेटे व पुत्रवधु के असमय काल के ग्रास बनने के बाद शगुन और उसके दो भाई बहनों का बोझ रामफल के बूढ़े कंधों में आ गया था। रामफल पास वाले के कस्बे में दर्जी का काम कर जैसे- तैसे घर की गाड़ी खींच रहे थे कि महामारी ने दुकान बंद कर घर बिठा दिया।

“राकेश, बेटा शगुन ने महीने भर से कोई कार्य नहीं किया न ही ई-पेपर दिये।  ऐसा ही चलता रहा तो….

जाने अब स्कूल कब खुलते हैं ? क्या तुम शगुन के किसी जानकार का नंबर दे सकते हो जिस पर मैं उसे काम भेजूँ? क्या तुम उसे पढ़ा सकती हो? तुम तो जानते हो इन बच्चों के पिता नहीं हैं।”

राकेश ने सहर्ष उत्तर दिया, “जरूर मैडम जी मैं अपने भाई को पढ़ाता ही हूं .. आप मेरे पापा का नंबर लिखिए … “

मीनाक्षी ने नंबर लिखा और उस पर घर का काम भेज दिया।

    उसी शाम “पापा कहाँ हैं?”

              “घर पर नहीं हैं।”, बंजारन ने दरवाजे पर पर्दा डालते हुए कहा।”

“” उनका फोन तो ये रहा .. “

बंजारन ने लपक कर फोन उठाया।

“कहा न…. वो घर पर नहीं हैं बाहर गए हुए हैं। चले आते हैं रोज भिखमंगों की तरह …”

“क्या हुआ?  काहे शोर मचा रखा है?”

“पापा मुझे फोन  चाहिए।”, राकेश ने मनुहार पूर्ण स्वर में कहा।

“बित्ते भर का छोरा! इन्हें अभी से फोन चाहिए।  कह दो इसे मेरे घर ना आया करे। जब ​​देखो कुछ ना कुछ मांगने चला आता है।”

“उल्लू के पट्ठे …. तुझसे बहुत बार कहा है, इधर मत आया कर। भाग यहाँ से कोई फोन वोन नहीं है। ज्यादा पर निकल आए हैं। आवारा कहीं का …” पिता के व्यवस्थित घर से लानत मलामत का बोझ उठाए राकेश अपने खंडहर से गिरते हुए पुराने घर में चला आया। शाम को बिना कुछ कहे सुने, बिना कुछ खाए पिए मुंह ढक कर सो गया। जब अगले रोज भी देर तक नहीं उठा तो माँ ने माथा छूकर पूछा – “क्या बात है बेटा सब ठीक है?”

 अब राकेश से रहा नहीं गया .. 

“मां ने मैंने पहले भी कहा था कि मेरा ट्यूशन लगा दो पर आपने वह भी नहीं लगाया।  मुझे फोन की जरूरत है मेरी सारी पढ़ाई आजकल फोन के द्वारा हो रही है। कोई मुझे फोन नहीं दिखाता । मां अगर ऐसे ही चलता रहा तो मैं फिर मजदूर ही बनकर रह जाऊंगा। “

“अरे पगले मेरे पास कौन से पैसे रखे हैं जो मैं तुझे फोन दिलवा दूँ।”माँ ने अपनी असमर्थता जाहिर की। 

“तुम ऐसे करो मेरे स्कूल वाले पैसों में से पैसे निकाल लो। वह मेरे ही पैसे हैं।”

“नहीं रे .. थोड़े बहुत पैसे हैं, कभी बुरे वक्त में काम आएंगे।”

“और कौन सा मुश्किल समय आएगा माँ… जब वह काम आएंगे? अब जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है अभी  काम न आए तो क्या फायदा ऐसे पैसों का! इस वक्त हमें शिक्षा की बहुत जरूरत है, मां! अभी चलो हम बैंक से पैसे लाते हैं। मुझे फोन चाहिए तो बस चाहिए। सुमन के लाख मनाने पर भी राकेश नहीं माना और वो बैंक से पैसे  ले आए …।

मीनाक्षी के फोन की घंटी बज रही थी, “मैडम जी आप मेरा नंबर लिखिए …. इस नंबर पर आप शगुन का काम भेज दीजिए …. मैंने अपना फोन ले लिया है। इसी पर मेरे भाई का, शगुन का और उसके भाई बहनों का भी गृहकार्य होगा। मैं उनकी पढ़ाई में पूरी मदद करूंगा। आज से ये सबअपना सारा काम समय पर करके दिखाएंगे इसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूं।”pritiraghavchauhan.com 

     मीनाक्षी को लगा जैसे राकेश के स्वर में एक पिता का उद्घोष हो।
VIAPriti Raghav Chauhan
SOURCEpritiraghavchauhan.com
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. एक रचनाकार सदैव अपनी कृतियों के रूप में जीवित रहता है। वह सदैव नित नूतन की खोज में रहता है। तमाम अवरोधों और संघर्षों के बावजूद ये बंजारा पूर्णतः मोक्ष की चाह में निरन्तर प्रयास रत रहता है। ऐसी ही एक रचनाकार प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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