नदी

फिर तोड़कर चली है वो बांध और किनारे

0
815

फिर तोड़कर चली है वो बांध और किनारे

हँसते थे कभी जिसको अल्हड़ सी नदी कहकर

मायूस न हो लौटना अब उसका नहीं होगा

सदियों से था रोका अब जंगल भी चले बहकर

LEAVE A REPLY