कुछ शेर dil se

Dil se

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क्यों इतनी उलझने  क्यों इतने फासले हैं

गैर से लगने लगे अपनों के काफिले हैं

कारवां लिए एक गुबार साथ चल रहा

कैसा है यह सफर कैसे  यह सिलसिले हैं

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 इक बगूला बन चाहा के छू लूं आसमां

पर किस्मत ए सहरा में ऊंचाइयां इतनी कहाँ

उलझनों के हल निकालूं कैद ए ख़ल्वतों से

 पर किस्मत ए तन्हा में तनहाइयां इतनी कहाँ

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 हो गया हूं यायावर तेरी एक हंसी की खातिर

तू ही कह किस चमन से ढूंढ कर लाऊं इसे

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इक खुदा है मेरा ये अहसास साथ लेकर

निकल पड़ा हूं एक बनवास के लिए

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अंधेरो डाल दो आंचल मुझ पर

उजले कफन से तंग आ गया हूँ मैं

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ढूंढ कर तो देख गैर ए गम में अपना गम

है तन्हा जो है आज यूं तन्हा ना रहेगा

गैर ए गम ही है तन्हा इलाज़ ए तन्हाई

तन्हा होकर भी वह पास हर लम्हा रहेगा

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तुम जिंदगी की खोज में सड़के नापते रहे

मैं इंतजार ए ज़िन्दगी  में ज़िन्दगी जीता गया

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मेहमान ही तो हूं एक रोज चला जाऊंगा

दर-ओ-दीवार से कह दे तन्हा रहना सीख लें

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वह जो खुद जलकर रोशन कियेे है राह को

कहते हैं लोग उसको वह घर जला देगा मेरा

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 बरस भी जा ऐ घटा समेट लूंगा मैं तुझे

सहारा हूँ इतना तो बखूबी निभा लूंगा

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अगला यू पलकों से तेरा थामे रहना एक नदी

मरने भी ना देगा मुझे जीने भी ना देगा कभी

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तू ना रह उदास खुदा के लिए

 मैं भी हूं तेरा यह दामन भी तेरा

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कभी कोई कह गया तन्हा

कभी यूं ही रह गया तन्हा

होना ही था लिखा तन्हा

तभी यूँ मै रह गया तन्हा

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 झुका दिया है सर हमने तो बंदगी के लिए

खुदा वह है कि नहीं यह खुदा जाने

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 तू कोई वर्क नहीं कि काला समझूं

शफक भी नहीं कि उजाला समझूं

हलावत है कि हलाहल कोई

तू ही कह कौन सा प्याला समझूं

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भटकता रहा मैं जिस आसमां को

क्या यह उसी आसमां की जमीं है

यह रेतीला सहरा अकीदत के काबिल

हरगिज़ नहीं है हरगिज़  नहीं है

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VIAप्रीति राघव चौहान
SOURCEPriti Raghav Chauhan
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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