कंदील

इक रात मैंने मन्नतें देखीं अजब जलते हुए पहुंच कर उस तलक नामुराद वापस आ गईं….

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हवा में कंदीले बहुतेरी बेशुमार थीं

मन्नतें सभी की अपार अपरंपार थीं

हमनें भी इक दिल्लगी में उड़ा दी

सुबह मेरी छत पर बुझी हुईं हजार थीं….

        ………..

इक रात मैंने मन्नतें

 देखीं अजब जलते हुए

पहुंच कर उस तलक

नामुराद वापस आ गईं…. .

……. ….. 

मासूम कंदीले

जानती कहाँ हैं

उनमें जो धुंआ हैं

चीन ने भेजा है…

………………… 

कंदीले स्वप्निल किसी  

 संसार में निकल गईं

लौटना हो कैसे कब

अब कोई परवाह नहीं….

……………

नीलकंठ को देख  

मूंद लें आँखें

या टूटते तारे

को देख जोड़ लें हाथ

या फिर उड़ा दें

मन्नत नशीं

रंग बिरंगी कंदीले हवा में 

चाहतें बस वही होती हैं पूरी 

जो बन्दआँआँखों से ढलकर

उस तलक पहुंचती हैं…..

……. उपरोक्त पंक्तियों पर एकमात्र अधिकार लेखिका का है। 

 

 

 

VIApriti Raghav Chauhan
SOURCEPriti Raghav Chauhan
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नाम:प्रीति राघव चौहान शिक्षा :एम. ए. (हिन्दी) बी. एड. एक रचनाकार सदैव अपनी कृतियों के रूप में जीवित रहता है। वह सदैव नित नूतन की खोज में रहता है। तमाम अवरोधों और संघर्षों के बावजूद ये बंजारा पूर्णतः मोक्ष की चाह में निरन्तर प्रयास रत रहता है। ऐसी ही एक रचनाकार प्रीति राघव चौहान मध्यम वर्ग से जुड़ी अनूठी रचनाकार हैं।इन्होंने फर्श से अर्श तक विभिन्न रचनायें लिखीं है ।1989 से ये लेखन कार्य में सक्रिय हैं। 2013 से इन्होंने ऑनलाइन लेखन में प्रवेश किया । अनंत यात्रा, ब्लॉग -अनंतयात्रा. कॉम, योर कोट इन व प्रीतिराघवचौहान. कॉम, व हिन्दीस्पीकिंग ट्री पर ये निरन्तर सक्रिय रहती हैं ।इनकी रचनायें चाहे वो कवितायें हों या कहानी लेख हों या विचार सभी के मन को आन्दोलित करने में समर्थ हैं ।किसी नदी की भांति इनकी सृजन क्षमता शनै:शनै: बढ़ती ही जा रही है ।

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